रविवार, 1 मार्च 2026

फागुन के नवरंग हैं [ दोहा ]

 097/2026



[ होली,रंग,गुलाल,भंग,धमाल]

                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


              सब में एक

होली है  मधुमास  का, रंग  भरा त्योहार।

भेदभाव  भूलें  सभी,  करें  सुहृद आचार।।

होली के    हुड़दंग  में,  भूलें  नहीं विवेक।

गले मिलें सद्भाव   से,त्याग   भाव अतिरेक।।


फागुन    के  नव रंग में, नर -नारी आबाल।

तितली भौरें     झूमते, उड़ने   लगा गुलाल।।

रंग-रँगीली    सृष्टि  है,रँगा   हुआ मन मोर।

कुहू-कुहू   कोयल  करे,   स्पंदित    हर पोर।।


बरसाने   में   रंग   की,बही   मृदुल बौछार।

उड़ता लाल गुलाल भी,होली का त्योहार।।

देवर-भौजी   खेलते,  भर -भर  रंग गुलाल।

मर्यादा   के  मान   की, जलती  हुई मशाल।।


रंग  भंग  के    खेल में, उठतीं प्रबल तरंग।

ब्रजबाला  मदमस्त  है, नर -नारी    हैं दंग।।

जब   तरंग  हो भंग की,  शेष न रहे विवेक।

अंग -अंग   है   रंग  में,हलचल  बढ़ीं अनेक।।


सोच-समझकर  खेलना,  रंगों   का त्योहार।

सीमित रहे धमाल भी,मिटे न मन-उजियार।।

बालक  युवा  किशोर भी,करते खूब धमाल।

डफ    ढोलक  मंजीर  के,फड़क रहे हैं गाल।।


                एक में सब

होली   प्रेमिल   पर्व  है,  लाया   रंग गुलाल।

पीते जन कुछ भंग भी,  करते   धूम धमाल।।



शुभमस्तु !


01.03.2026◆12.15प०मा०

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