104/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सदा कर्म हैं साथ हमारे।
जीव जिएं सब कर्म-सहारे।।
कर्म योनि के दाता होते,
कर्म चमकते बनकर तारे।
कीट मनुज खग जलचर नाना,
कर्माश्रित हैं थलचर सारे।
स्वर्ग-नर्क कर्मों से बनते,
मधुर नीर या सागर खारे।
निशा दिवस सम जन का जीवन,
सघन तमस रवि के उजियारे।
सत्कर्मी सुख - शांति भोगता,
कर्मों के फल टरें न टारे ।
बुरे कर्म से डूबे तरणी,
'शुभम्' कर्म नित जीव उबारे।
शुभमस्तु,
09.03.2026◆4.30 आ०मा०
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