114/2026
समांत : ईर
पदांत :अपदांत
मात्राभार :24.
मात्रा पतन :शून्य।
©शब्दकार
डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सबसे पहले देश है, रक्षक धीर प्रवीर।
जाति-संकुचन व्यक्ति का, देता पद न कबीर।।
हितकर हो जो देश को, करना है वह काम।
ऊँच -नीच के भेद के, नहीं चलाएँ तीर।।
सार्थक मानव योनि है, जिए देश के हेत।
कर्मों की सद्गन्ध का, उड़ता रहे उशीर।।
भर लेते हैं श्वान भी, यों तो अपना पेट।
परपीड़ा जो जानते, कहलाते वह पीर।।
पढ़े-लिखे शिक्षित सभी, अनपढ़ मूढ़ गँवार।
जातिवाद के भक्त हैं,अंधा बाँटे खीर।।
देश रसातल को गया, जातिवाद से आज।
सोच बड़ी संकीर्ण है,देश दिया है चीर।।
'शुभम्' समर्पित देश को,भारत जिसका नाम।
नित सेवी साहित्य का, तोड़ क्षुद्र जंजीर।।
शुभमस्तु,
23.03.2026◆4.30 आ०मा०
◆◆◆
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें