111/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
अंबर धरती बीच
शून्य सँग
फहरा नवल तिरंगा।
प्राची में केसरिया
लहरे
कहता रे जन जागो
तन -मन में
जो आलस व्यापित
उसे शीघ्र ही त्यागो
त्याग तपस्या
धर्म कर्म की
बहे सदा ही गंगा।
भू पर
हरे -भरे खेतों में
श्रमिक कर्म में लीन
खुशहाली का
वे प्रतीक हैं
भाव नहीं मन दीन
कोई रहे न
भूखा -प्यासा
तन से मानव नंगा।
श्वेत गगन में
खग दल उड़ता
हर लेता तम सारा
कलरव से
गुंजित है कण -कण
प्रसरित नव उजियारा
नव उल्लास
नवोदित प्रतिपल
तन-मन जन का चंगा।
शुभमस्तु,
17.03.2026◆9.00आ०मा०
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