121/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
बौराए हैं आम
बाग में
महक रही है अमराई।
ऋतु वसंत का
हुआ आगमन
कुहुक-कुहुक कोकिल कूके
कानों में
अमृत घुलता है
नहीं एक पल को चूके
कभी हवा
चलती है पछुआ
कभी लहकती पुरवाई।
भौंरे चले
झुंड में अनगिन
चलो मंजरी को चूमें
मतवाले हों
पीकर मधुरस
ले-ले अँगड़ाई झूमें
मुस्काती हैं
अरुण कोंपलें
गमक रही नव तरुणाई।
रहें तितलियाँ
क्यों अलि दल से
मधुरस पीने में पीछे
रंगबिरंगी
पहन साड़ियाँ
चहक रहीं ऊपर नीचे
भू पर बिछी
पीत चादर-सी
मंजरियों की उफनाई।
शुभमस्तु,
31.03.2026◆5.15 आ०मा०
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