113/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब लफ्ज़ का खेल है
साहित्य हो
या सियासत,
साहित्य में सत्य है
पर सियासत में
'सत' कहाँ?
साहित्य
लफ्ज़ की कला
लफ्ज़- लफ्ज़
कला के साँचे में ढला,
कवि के
मुखारविंद में पला,
करता हुआ
सबका ही भला।
दूसरी ओर सियासत
लफ़्फ़ाजी का घूर
जहाँ सत्य नहीं दूर- दूर,
सर्वथा असत्य ही भरपूर
चमचों की चमक का नूर,
तिरछी कर दृष्टि
जनता को रहा घूर।
लफ़्फ़ाजी
मात्र लफ्जों का ढकोसला,
कोयल के अंडे
कौवों का घोंसला,
कहीं दूर नहीं जाना,
क्या आपने
अभी तक नहीं पहचाना?
शहर के हर चौराहे
और मंचों पर नाना,
जिनका काम है
मात्र जनता को लुभाना
उलझाना
मूर्ख बनाना।
लफ़्फ़ाजी से ही तो
बना है
देश की सियासत का
तानाबाना,
उद्देश्य एकमात्र
अंधभक्तों की फौज का
खोल देना कारखाना,
जहाँ अंधभक्तों को
साँचें में ढलवाना।
देश 'विश्वघूर' बन गया है,
लफ़्फ़ाजी को देखो
कैसा तन गया है,
आप बड़े समझदार हैं
पहले ही सब समझ गए हैं
फिर बताने -जताने को
बचता ही क्या है !
इधर से उधर चारों ओर
'हुआ' ही 'हुआ' है।
शुभमस्तु ,
20.03.2026◆6.45 आ०मा०
◆◆◆
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें