शुक्रवार, 27 मार्च 2026

अहंकार [अतुकांतिका]

 117/2026


                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अहंकार 

यों ही हार नहीं मानता

वह मरेगा और मारेगा

क्या वह नहीं जानता?


अनादिकाल से

अहंकार

खेल खेल रहा है,

अविवेक के साथ

उसका तालमेल रहा है।


आत्महंता है अहंकार

नहीं जानता वह दुत्कार

भरता रहता है

क्षण -क्षण वह फुंकार

इसीलिए तो हो रहा है

आज दुनिया में हाहाकार।


अहंकार को 

कैसे और क्यों समझाओगे

उसके मूल में

विनाश अंतर्निहित है,

वह नहीं जानता कि 

यह सब अनुचित है।


पीछे हटना

 उसने सीखा नहीं,

साँप के बिल में

हाथ जो डालेगा

उसे साँप

डसेगा ही डसेगा,

इंतजार कीजिए

और अहंकार की

विनाश लीला को देखिए।


शुभमस्तु,


27.03.2026◆5.00आ.मा.

                    ◆◆◆

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