गुरुवार, 5 मार्च 2026

होली है ये होली है [ दोहा ]

 102/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भाँग  पीएं साहित्य की, कुछ जन हैं बेहोश।

छलनी हुए चरित्र में,सबल   देह  का जोश।।

चंदा   से   धंधा   करें,झोंक   आँख  में धूल।

भैंस सहित खोया  बना,भले हिल रही चूल।।


साझा   संग्रह   छाप कर,  खूब मचाई धूम।

कृपावन्त  मोबाल  है,  कलियाँ  जातीं चूम।।

शुभम् शराबी हो गया,किया व्यंग्य-रस पान।

सत्य -सत्य  ही बोलता, नहीं   झूठ गुणगान।।


दूध   धुले  नेता   यहाँ,   होता  देश विकास।

जनता को कण भर नहीं,उनसे  कोई आस।।

नरक पालिका की  बनी,नाली खुली हजार।

होली   खेलो     प्रेम  से,डाल  उपानह हार।।


अधिकारी   नेता    सभी,  करें   ऊपरी आय।

पेट   नहीं   भरता कभी,चाह  बड़ी निरुपाय।।

बिना  ऊपरी    आय के,  चले  न  कोई काम।

छुरी चलावें   पेट  में,   मुँह    से   जपते राम।।


जन्मजात    है  भृष्टता,  नर- नारी  के बीच।

करें  मिलावट लीद की, लगे सुगंधित कीच।।

धुले   नहीं   हैं  दूध से, शिक्षक  और वकील।

सबसे   ऊपर   हैं   वही, जन के ऊपर हील।।


होली के   परिवेश  में, खुली  मनुज की पोल।

मुख   धोया   जाना  तभी,नेताजी अनमोल।।


शुभमस्तु,


04.03.2026◆11.30 आ.मा.

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