108/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
जीवन है मधुयामिनी,जब तक है मधुवास।
समय न रहता एक-सा,सदा न रहे उजास।।
तब त्रेता में दुष्ट था, रावण केवल एक,
कलयुग में रावण घने,हरते शांति-सियास।
पाप बढ़ा है सोच में, दूषित मन के तार,
शांति-सिया कैसे बचें,अमरीका का त्रास।
मानवता मन में नहीं, रहा नहीं कुछ शेष,
वन्य हुआ है आदमी, बुद्धि चर रही घास।
ढोंग सभ्यता का करे, अणुबम का कर शोर,
मानस जिसका मर गया,हिंसा का वह दास ।।
शक्ति प्रदर्शन हिंस्र का,क्षम्य नहीं पल एक,
समय बड़ा बलवान है, करता पल में ह्रास।
'शुभम्' मूढ़ क्यों चेतता,नहीं इसी क्षण कूर,
करवाता है आप ही, अपना तू उपहास।
शुभमस्तु,
16.03.2026◆1.45आ०मा०
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