101/2026
[फागुन,फाग,भाँग,गुलाल,अबीर]
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
जी ले जी भर जगत में,फागुन के दिन चार।
पिचकारी ले प्रेम की, चला रंग-बौछार।।
फागुन में कलियाँ खिलें, कोयल करे गुहार।
अमराई मह-मह करे, चलती रंग-फुहार।।
डफ ढोलक बजने लगे,मची फाग की धूम।
अलिदल झूमें बाग में,सुमन रहे हैं चूम।।
फाग बिना फागुन नहीं,राग बिना क्या गीत।
आग बिना क्या ताप है,प्रियल बिना क्या प्रीत।।
पिए भाँग जो प्यार की,उसे कहाँ है होश।
उचित नहीं इतना सखे,जीवन में ये जोश।।
भाँग -धतूरा नित्य ही, शिव शंकर का भोग।
करते हैं विष पान जो, करें जगत नीरोग।।
रँग- गुलाल उड़ने लगा, आया है मधुमास।
होली के हुड़दंग में, सी-सी करे फरास।।
बरसाने में उड़ रहा, पीला लाल गुलाल।
ब्रजबालाएँ नाचतीं, ब्रज में मचा धमाल।।
मला गाल पर श्याम के,ज्यों ही लाल अबीर ।
शरमाई ब्रज बालिका, भूल गई निज चीर।।
कोई गाता फाग है, गाते कहीं कबीर।
चंदन महके भाल पर,सज्जित गाल अबीर।।
एक में सब
भाँग गुलाल अबीर की,मची हुई है धूम।
फागुन गाए फाग ही,इधर- उधर जा घूम।।
शुभमस्तु,
04.03.2026◆8.00आ०मा०
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