112/2026
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डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
एक बड़ा -सा हाल लोगों से खचाखच भरा हुआ था।उसमें सैकड़ों पंक्तिबद्ध लोग कुर्सियों पर बैठे हुए परस्पर वार्तालीन थे। सामने की एक पंक्ति में कुछ सम्मानन्नीय लोगों के मध्य मैं भी बैठा हुआ था। तभी क्या देखता हूँ कि एक व्यक्ति मेरे तथा अन्य कुछ लोगों के सामने पड़ी हुई मेज पर एक -एक फाइल रखता जा रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि कोई प्रतियोगितात्मक कार्यक्रम होना है,जिसमें हम इने-गिने लोगों को निर्णायक बनाया गया है।
तभी मेरे पीछे बैठे हुए एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा -रस आया था,क्या आपको मिला? उसके इस अनायास प्रश्न पर मैंने भी कह दिया -'वैसे मैं नीरस नहीं। रस मैं पीता नहीं।' मेरे इस प्रत्युत्तर पर वह निःशब्द हो गया। तभी यकायक मेरी आँख खुल गई और मैं बिस्तर से उठ कर बैठ गया। कर्पूर दान के मध्यम प्रकाश में समय देखा तो ब्रह्म मुहूर्त के सवा तीन बज रहे थे। और मैं यह सोचने लगा कि यह कैसा स्वप्न था। घटित हुई पूरी घटना के साथ उस व्यक्ति द्वारा मुझसे पूछा गया प्रश्न और मेरा उत्तर मुझे नहीं भूला और तुरंत मोबाइल खोलकर एक स्थान पर उन्हें अंकित करने के साथ -साथ अपने हृदय पटल पर भी लिख लिया और सोचने लगा कि यह रस को पीने ,मेरे द्वारा स्वयं को नीरस नहीं होने और रस न पीने की बात का अर्थ क्या है? मंतव्य क्या है ? यह स्वप्न -संस्मरण मेरे अवचेतन से पूर्ण चेतन होने की अवस्था में साकार हुआ,जिसे आपको बता रहा हूँ। यदि आप इस तथ्य पर कुछ प्रकाश डाल सकें तो मुझे भी बताने की कृपा करें।
चूँकि मैं एक अकिंचन कवि हूँ। इसलिए रस तो मेरे काव्य और जीवन का प्राण तत्त्व है।उधर मधुमेही होने के कारण मीठे रस खाद्य या रस आदि से दूर भी रहता हूँ। यही वास्तविकता है।उस व्यक्ति ने जिस अभिधा भाव से प्रश्न किया ,उसका प्रत्युत्तर मेरे द्वारा व्यंजना और अभिधात्मक रूप से दिया जाना युक्तिसंगत ही लगा,जिससे मैं अपने अंतर मन में पूर्णतः संतुष्ट हूं।जब काव्य के नौ- नौ रस इस उरस्थल में निरंतर बहते हों तो किसी बाहरी रस की कोई आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है। उस व्यक्ति ने भले ही हास्य किया हो या यथार्थ में पूछ लिया हो किन्तु मेरा सटीक उत्तर पाकर वह निरुत्तर हो गया। ये भीड़ ,दर्शक,श्रोता, फाइल आदि किस बात के प्रतीक हो सकते हैं, कहा नहीं जा सकता।
प्रायः हम लोग जागरण के बाद स्वप्नों को भूल जाया करते हैं,किंतु इस स्वप्न का विस्मरण न होना और और उस पर अपना मंतव्य प्रकट करना कुछ तो विशेषार्थ हो सकता है ! स्वप्न तो स्वप्न ही है,कहकर टाला भी नहीं जा सकता और उसे प्रायः विशेष गहनता के साथ ग्रहण भी नहीं किया जाता । पर क्या किया जाए इस नाचीज़ 'शुभम्' को माँ सरस्वती ने एक कोमल और विचारक मन भी तो दिया है,उसका क्या ? वह किसलिए काम आएगा। जब एक विचारक और चिंतक ही चिंतन नहीं करेगा तो क्या देश- विदेश के तानाशाह विचार करेंगे? उन बेचारों को वैसे ही अवकाश नहीं है ! जो भी है,जो जैसा था;मैंने आप के समक्ष व्यक्त कर दिया। यदि आप भी अवकाश में हों तो विचार करें।
शुभमस्तु ,
17.03.2026◆9.45आ०मा०
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