बुधवार, 11 मार्च 2026

कर्म योनि के दाता होते [ सजल ]

 103/2026


       

समांत          : आरे

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      :16.

मात्रा पतन    :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सदा   कर्म     हैं     साथ     हमारे।

जीव    जिएं     सब   कर्म-सहारे।।


 होते कर्म     योनि     के     दाता ।

कर्म     चमकते     बनकर    तारे।।


कीट मनुज   खग   जलचर  नाना।

कर्माश्रित    हैं      थलचर    सारे।।


बनें  कर्म   से    स्वर्ग-नर्क      सब।

मधुर  नीर     या     सागर   खारे।।


निशा दिवस सम  जन का जीवन।

सघन तमस  रवि  के    उजियारे।।


सत्कर्मी  सुख - शांति      भोगता।

कर्मों  के  फल     टरें      न  टारे ।।


बुरे  कर्म      से      डूबे      तरणी।

'शुभम्'  कर्म    नित  जीव  उबारे।।


शुभमस्तु,


09.03.2026◆4.30 आ०मा०

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