103/2026
समांत : आरे
पदांत : अपदांत
मात्राभार :16.
मात्रा पतन :शून्य।
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सदा कर्म हैं साथ हमारे।
जीव जिएं सब कर्म-सहारे।।
होते कर्म योनि के दाता ।
कर्म चमकते बनकर तारे।।
कीट मनुज खग जलचर नाना।
कर्माश्रित हैं थलचर सारे।।
बनें कर्म से स्वर्ग-नर्क सब।
मधुर नीर या सागर खारे।।
निशा दिवस सम जन का जीवन।
सघन तमस रवि के उजियारे।।
सत्कर्मी सुख - शांति भोगता।
कर्मों के फल टरें न टारे ।।
बुरे कर्म से डूबे तरणी।
'शुभम्' कर्म नित जीव उबारे।।
शुभमस्तु,
09.03.2026◆4.30 आ०मा०
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