397/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
दीवाली के
वे भी दिन थे
माँ का ज्योति जगाना।
गोबर माटी से
घर लीपे
सौंधी गंध सुहाए
माटी के
दिवलों में भरकर
घर में दीप जलाए
माटी की लक्ष्मी
गणेश की
प्रतिमा को पुजवाना।
जगमग- जगमग
करे अवलियाँ
दीवट काजल पूरे
मंदिर छत
घर आँगन देहरी
छोड़े नहीं अधूरे
काजर आँज
आँख में मेरी
मन-मन बहुत सिहाना।
वेला भोर हुई
जब उजली
उषा लाल चमकाए
सूप उठाकर
खट -खट करती
दारिद दूर हटाए
तब करती
जा स्याहू पूजन
घृत का दिया जलाना।
तब बिजली की
झालर लड़ियाँ
एक नहीं थी जलती
जलते थे
माटी के दीपक
मन में मीन उछलती
छत पर जाकर
समा निहारें
युग था वही पुराना।
शुभमस्तु,
07.11.2026 2.00 प०मा०
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