रविवार, 7 दिसंबर 2025

चित्रगुप्त [ अतुकांतिका ]

 710/2025



              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हर आदमी की

स्त्री की भी

हर साँस का

खींच कर रखते हैं,

गुप्त चित्र

जिन्हें चित्रगुप्त कहते हैं।


कितनी साँस ली हैं 

अब तक,

कितनी और

शेष हैं तब तक

जब तक

वेला विदाई की

न आ जाये।


कर्मों का लेखाजोखा

 हर एक का

एक्सरे बना रखा है,

कि जीवात्मा जब कहे

ऐसा नहीं था,

तो वक्त पड़े काम आए।


महालेखाकार

एक ही है

हर जीव का

हर जंतु का

हर चराचर तंतु का

जो आपके 

हमारे सबके

कर्मों के

चित्रगुप्त हैं।


नियुक्ति है

भगवान के दरबार में

उनकी लेखनी

और बहीखाता

कभी रुकते नहीं,

पल -पल की 

गणना है,

खुले जब 

तेरा बहीखाता

उन पर नहीं

बिगड़ना है,

जो बनना

 बिगड़ना है,

तेरा ही गिरना -

चढ़ना है।


शुभमस्तु !


04.12.2025 ●1.45 प०मा०

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अभिमान [ सोरठा ]

 709/2025


                 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


होता नष्ट विवेक,  करता  है अभिमान जो ।

काम न करता नेक,खोता शुभता सोच की।।

करता जो अभिमान,कुफल भोगता आदमी।

स्वयं   करे   अवसान, राहें रुकें विकास की।।


मूढ़ बुद्धि बलवान,फूल गया अभिमान में।

रुदन बन गया गान,काम न आई शक्ति भी।।

होता है यह सत्य,झुके शीश अभिमान का।

बिगड़ें सभी अपत्य,राह नहीं निज सूझती।।


करता नहीं विकास,करके नर अभिमान को।

जग में हो उपहास, गिरता  कूप विनाश के।।

जान रहा संसार,रावण के अभिमान को।

तन -धन गया सिधार,लंका सोने की जली।।


मथुरा का वह कंस,भूल गया अभिमान में।

उड़ा एक दिन हंस,कृष्ण विष्णु हरि रूप हैं।।

मानव का अभिमान,विकृत करता बुद्धि को।

ताने   तमस -वितान,  उस  जैसा कोई नहीं।।


देह   रूप   अभिमान, चार दिनों की चाँदनी।

जब होगा अवसान,  मिले  खाक में रूप ये।।

वृथा सभी अभिमान,तन धन या निज रूप के।

बचे न  कण  भी धान, मिल जाते सब खेह  में।।


जब   पड़   जाए एक,परदा  बुद्धि विवेक पर।

होता शून्य  विवेक,  वही   काल अभिमान  है।।



शुभमस्तु !


04.12.2025●9.45आ०मा०

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सरसों फूली खेत में [ दोहा ]

 708/2025


           

[ठिठुरन,अलाव,शीत,हेमंत,शिशिर]


   ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                सब में एक

अगहन बीता  पौष में, बढ़ा शीत का कोप।

ठिठुरन भी बढ़ने लगी,घटा भानु का ओप।।

ठिठुरन से खग ढोर जन,बहुत हुए बेहाल।

वस्त्र नहीं यदि गात पर,खड़ा दीखता काल।।


शीत-निवारण   के लिए,जलने लगे अलाव।

मिला ताप-संपर्क  तो, घटता  शीत-प्रभाव।।

पौष -माघ  की   शीत में,  करते  दीन उपाय।

घर में जला अलाव को,पिएं गर्म कुछ चाय।।


कम   कपड़ों   में खेलते, बालक मचती धूम।

उन्हें    सताए शीत  भी,  न्यून   रहे वे घूम।।

वृद्ध   जनों   को शीत से,होता है अति कष्ट।

चलने    में   कमजोर  हैं ,  तत्परता   भी नष्ट।।


अगहन     पूरे   पौष    में, राज  करे हेमंत।

बहुत दूर  है  आज  से, अपना  मधुर वसंत।।

शरद  गई हेमंत  का,  बढ़ने  लगा प्रभाव।

अलसाए  रवि  देव  हैं,  घटा  हुआ  है ताव।।


माघ और फागुन युगल, शिशिर चलाए  चक्र।

सरसों   फूली   खेत   में, होता   समय अवक्र।।

शिशिर शीत जिसने सहा,समझो है वह  पार।

फूलें   फूल    वसंत   के, मधुऋतु   से उद्धार।।


                      एक में सब

ठिठुरन बढ़ती शीत की,जलने लगे अलाव।

शिशिर और हेमंत में, घटता   भानु प्रभाव।।


शुभमस्तु !


03.12.2025●6.00आ०मा०

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मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

जाड़े का परिहार करें [ गीत ]

 707/2025


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आओ पहले

आग जलाकर

जाड़े का परिहार करें।


शीत  सताए

तन-मन काँपे

काम नहीं  अपना चलना 

पहले करें

इकट्ठी लकड़ी

आग जला रोकें कँपना

अगियाना

अब बना हमारा

गर्मी का संचार करें।


पकड़ी जाती 

नहीं हाथ में 

इतनी ठंडी टंकी है

हाथ सेंकना

प्रथम जरूरी

करना अपने मन की है

देखो उधर

कुहासा छाया

लपटों का हम वार करें।


नहीं देह पर

कपड़े इतने

ऊनी शॉल नहीं साड़ी

दूध बाँटना

रोज हमें ही

गाँव-गाँव ऑंगनबाड़ी

मौसम बिगड़ा

काम रुके क्यों

हम-तुम यही विचार करें।


शुभमस्तु !


02.12.2025●5.आ०मा०

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भजन [ चौपाई ]

 706/2025


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्रभु  का    भजन    करे  सब  पाए।

ध्यान    मग्न    हो    प्रीति  जगाए।।

भजन  भाव  में  सब    दुख   नाशे।

मानव  जीवन     कर्म        तराशे।।


राम  भजन   रत    नित   हनुमंता।

भजते हैं   सब      साधु   सुसंता।।

इष्ट देव  को    नित   हम     ध्याएँ।

ज्ञान   यजन  में     चित्त    लगाएँ।।



शंभु-भजन   हरि  नियमित  करते।

हरि के भजन    लीन   शिव रहते।।

भक्ति  भाव  को    भजन   जगाए।

हरि सुमिरन    की    गंग    नहाए।।


प्रभु को   सदा     हृदय    में    धारें।

बिना   याचना      पाप      निवारें।।

यही  भजन   है  अच्छा   सबसे।

रीति  चली है    ये     युग-युग   से।।


माता - पिता   और    गुरु     न्यारे।

भजें इन्हें     संतति     सब  प्यारे।।

भजन पिता - माता   की   सेवा।

सब सुख   दायिनि    दात्री   मेवा।।


भजन-कीरतन      में   चित  लाएँ।

सुख   साधन का    साज   सजाएँ ।।

बार -बार     गुण   कथन   कराना।

श्रेष्ठ  भजन     है   युगों     पुराना।।


'शुभम्'  भजन  की महिमा गाए।

बार -बार      तुमको      समझाए।।

भजन  बिना  भव   पार   न   होना।

योनि-योनि    में    पड़ता      रोना।।


शुभमस्तु !


01.12.2025●6.15 प०मा०

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सकल विश्व में मचती हलचल [ गीतिका ]

 705/2025


      

© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सकल   विश्व   में  मचती  हलचल।

शांति    हनन  होता  है     हरपल।।


तन-मन     से   बेचैन        आदमी,

उसे   न पड़ती पल भर   को कल।


गर्त    पतन  का  विषम   गहनतम,

रहा  प्रगति का अब   सूरज   ढल।


सिंधु  शरण  में    सरिता  प्रसरित,

नित्य   निरंतर   कलकल है  जल।


सीधी   चाल   न    चले     आदमी,

वक्र  हुए हैं    मस्तक     के   बल।


नगरपालिका         वाले      सोते,

बहें  सड़क पर  अविरल   ये  नल।


'शुभम् '   तीसरा    नेत्र   खुला  है,

निखिल  जगत में   रुद्र   अमंगल।


शुभमस्तु !


01.12.2025●5.00आरोहणम मार्तण्डस्य।

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तन-मन से बेचैन आदमी [ सजल ]

 704/2025


         

समांत          : अल

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      :  16

मात्रा पतन   : शून्य


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सकल   विश्व   में  मचती  हलचल।

शांति    हनन  होता  है     हरपल।।


तन-मन     से   बेचैन        आदमी।

उसे   न पड़ती पल भर   को कल।।


गर्त    पतन  का  विषम   गहनतम।

रहा  प्रगति का अब   सूरज   ढल।।


सिंधु  शरण  में    सरिता  प्रसरित।

नित्य   निरंतर   कलकल है  जल।।


सीधी   चाल   न    चले     आदमी।

वक्र  हुए हैं    मस्तक     के   बल।।


नगरपालिका         वाले      सोते।

बहें  सड़क पर  अविरल   ये  नल।।


'शुभम् '   तीसरा    नेत्र   खुला  है।

निखिल  जगत में   रुद्र   अमंगल।।


शुभमस्तु !


01.12.2025●5.00आरोहणम मार्तण्डस्य।

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...