077/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
शादी बंधन प्यार का, बँधा हुआ संसार।
नर-नारी बँधते सभी, जब यौवन का ज्वार।।
जब यौवन का ज्वार, ढूँढ़ते उत्तम जोड़ी।
धन भी लिया उधार, मिले बस सुंदर मोड़ी।
'शुभम्' वंश की बेल, बढ़ाएं करें मुनादी।
मित्रो चलो बरात , हमें करनी है शादी।।
-2-
बंधन यह संसार का,मिले जदपि अनचाह।
किंतु निभाना ही पड़े, बना आप ही राह।
बना आप ही राह, सहज हो या पथरीली।
चलना है अनिवार्य, भले वह सूखी गीली।।
'शुभम्' कर्म कर मीत, बना बंधन को चंदन।
महके जीवन - गीत,जगत का अनुपम बन्धन।।
-3-
आया था जब कुक्षि में, जननी के जब जीव।
बंधन है यह कर्म का, सुदृढ़ बनी जरीव।।
सुदृढ़ बनी जरीव, भजन प्रभु से वह करता।
मुक्त करो भगवान, जटिल बंधन के हर्ता।।
'शुभम्' शृंखला एक, कर्म की लेकर धाया।
मानव जीवन नेक, जटिल बंधन है आया।।
-4-
कितने बंधन जीव को, सुख-दुख के जो हेत।
कभी शिखर पर जा चढ़े,मिले कभी भू-रेत।।
मिले कभी भू -रेत, नियंत्रण एक न कोई।
तदपि नहीं है चेत, जदपि मर्यादा खोई।।
'शुभम्' जगत जंजाल, हजारों मिलते फितने।
बंधन अपने काट, मिले जीवन में कितने।।
-5-
चाहे अनचाहे मिलें, बंधन है संसार।
देह मिली है जीव की, करना ही है पार।।
करना ही है पार, कलपने से क्या होगा।
निज इच्छा से जीव, बदल क्या पाए चोगा??
'शुभम्' न तजता प्राण, कभी गाहे- अवगाहे।
निज बंधन को भोग, भले चाहे अनचाहे।।
शुभमस्तु,
06.02.2026◆7.30आ०मा०
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