शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

अनजान [ कुंडलिया]

 659/2025


                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

बालक   मैं   अनजान   हूँ,हे प्रभु जी    श्रीराम।

कृपा  करो इस दास पर,भजूँ   आपका  नाम।।

भजूँ    आपका   नाम,  बुद्धि   प्रभु  ऐसी  देना।

करूँ    हितैषी   काम, नाव   मेरी   नित   खेना।।

'शुभम्' शरण   में आज,पिता-माता  हो पालक।

महिमा  से   अनजान, आपका     नन्हा बालक।।


                         -2-

आया   था    संसार    में,   सबसे    मैं    अनजान।

मिले  जनक-जननी  सभी,  गुरुजन  श्रेष्ठ महान।।

गुरुजन    श्रेष्ठ       महान,    मित्र   सम्बंधी   सारे।

प्रिय    पत्नी   संतान, प्रणय  सह  नेह      दुलारे।।

'शुभम्' जगत  का  राग,   रंग  जब  मुझको भाया।

अपनाया      संसार ,  जन्म    ले   जग  में आया।।


                           -3-

लेना    मत   अनजान   से, मित्र  कभी  आहार।

पथ   में   हो   या   गेह   में,  पावन  हो आचार।।

पावन     हो    आचार,  किसी  से क्या है आशा।

भरे     स्वार्थ    से  लोग, न   पाले  कभी दुराशा।।

'शुभम्' आप   निज  नाव,सदा जगती में   खेना।

सगा   न  कोई  बंधु,  किसी  से  कुछ मत  लेना।।


                         -4-

मिलते    राही     राह   में, सत पथ से   अनजान।

पता  नहीं    होता    जिन्हें,  निज गंतव्य   महान।।

निज        गंतव्य     महान,    भटकते भूलभुलैया।

गिरते       हैं      जब     गर्त,   चीखते  दैया-दैया।।

'शुभम्'     वहीं   बहु  फूल,बाग में शोभन खिलते।

जिन्हें    राह    का   ज्ञान, अल्पतम   ऐसे मिलते।।


                         -5-

करता    लालच   आदमी ,  बना  हुआ   अनजान।

खा    जाता    धोखा    वही,  समझे  स्वयं  महान।।

समझे      स्वयं    महान, राह  में  भटका   रहता ।

बिना   लिए   पतवार,   खिवैया   सरि में  बहता।।

'शुभम्'    भरे   कुविचार,   गर्त में  जा गिर मरता।

मन   को      रखे    सुधार, वही   पथ  पूरा  करता।।


शुभमस्तु !


30.10.2025● 8.45प०मा०

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गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

चुँधियाता सोना हमें रहा है [ नवगीत ]

 658/2025


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


युग- युग से

चुँधियाता 

सोना हमें रहा है।


मरते दम तक

साँपों ने

है स्वर्ण सहेजा

मिथ्या गाड़

प्रतिष्ठा का ध्वज

 रहा तनेजा

अंध बुद्धि के

चपल करों ने

जिसे गहा है।


कितने आए

चले गए

रहा रोना का रोना

ला न सका

मुस्कान

कभी

यह पीला  सोना

जिसने भी

पाया सोना

वह सदा दहा है।


साँपों से 

भयभीत मनुज

पर डरा न सोना

अशुभ हुआ

मानव को

उसका पाना-खोना

प्रतिमा गहनों

ईंटों से चुन

स्वर्ण लहा है।


शुभमस्तु !


30.10.2025●12.15 प०मा०

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ज्यों चाँदी-सोना [ नवगीत ]

 657/2025


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


धनिकों की हर चीज

हमें लगती है मँहगी

ज्यों चाँदी-सोना।


खाते या कि

पहनते  होंगे

पता नहीं

दीवारों में

चुनवाते हों

वे लुका कहीं

आम आदमी

को सपना है

उसका होना।


भाव खा रहे

ऊँचे-ऊँचे

क्या  बतलाएँ

तोला भर

लाखों से ऊपर

हमें सताएँ

समझ न पाएँ

दुल्हनिया का

रोना -धोना।


नारी- हठ के

नहीं सामने

कोई टिकता

उसे चाहिए 

केवल सोना

नहीं न सिकता

तभी पड़ेंगीं

सात भवरियाँ

होगा  गौना।


शुभमस्तु !


30.10.2025 ● 11.45 आ०मा०

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सोना और साँप [ अतुकांतिका ]

 656/2025


       


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


साँपों  का

 सोने से सम्बंध

आजकल से नहीं

युग-युग से है,

सनातन है।


साँपों को सोने से प्यार है

सोना रक्षित और

साँप रक्षक हैं,

इसके लिए वे 

कुछ भी कर सकते हैं,

मार  और मर सकते हैं,

किंतु सोना 

 नहीं तज सकते हैं।


धरती में गाड़े हुए

बड़े-बड़े  स्वर्ण -खजाने

बहुत ही पुराने

सर्प-रक्षित हैं।


सर्पों के लिए

सोने की कोई

उपयोगिता नहीं,

मात्र रक्षा का दायित्व है,

आदमी सर्प की आत्मा में

उसका निर्वाह कर रहा है।


साँप और सोना

आज भी हैं, 

किसी का सोने से

पेट नहीं भरा अब तक,

भूख भी नहीं मिटी,

गड़ा रह गया सोना

एक रहस्य की तरह

ज़मीदोज़,

और साँप फन फैलाए

फुफकार रहे हैं।


शुभमस्तु !


29.10.2025 ● 9.00प०मा०

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मुझे भाता नहीं है [ नवगीत ]

 655/2025


         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लीक पर चलना

मुझे भाता नहीं है।


धार के ही

साथ 

मुर्दे  बहा करते

प्राण जिनमें

चीर धारा 

कर सँभलते

चेतना का

बोध जिसमें

लोरियाँ गाता नहीं है।


स्वयं घोषित

सूर्य को 

मैंने न माना

यों सितारों को

सभी 

मैं  खूब जाना

आकाश है

विस्तृत बड़ा 

मगर ताता नहीं है।


अस्मिता को

 तुम चुनौती

दे रहे हो

और निज

पतवार किश्ती

खे रहो हो

पर 'शुभम्'

अपने सुपथ 

गंतव्य निज पाता यहीं है।


शुभमस्तु !


28.10.2025●11.30 आ०मा०

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अन्याय के पर्याय हैं! [ नवगीत ]

 654/2025


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पूर्वाग्रहों से

ग्रसित जन

अन्याय के पर्याय हैं।


व्यक्ति की 

छवि को

विकृत करना जिन्हें है

अग्रणी 

जो चल सके

वही भरना  उन्हें  है

धारणा में

धूल धूसरता

कुपित अध्याय है।


मारते

दीवाल में

जो सींग हैं

शून्य में

लंबी 

लगाते पींग हैं

और कहते हैं

स्वयं को

वे दूध देती  गाय हैं।


हाथियों की

गैल को 

जो रोकता  है

मस्तमौला 

चाल को

जो टोकता है

टूट जाती

थूथनी

करते नहीं जो न्याय हैं।


शुभमस्तु !


28.10.2025● 11.00 आ०मा०

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प्यार में खोई युवा जोड़ी [ गीत ]

 653/2025


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्यार में खोई 

युवा जोड़ी

एकांत पल है।


फूल झरते 

पेड़ से 

अद्भुत समा है

घास में यों

प्यार का

आसन जमा है

एक दूजे 

के बिना 

पड़ती न कल है।


बेखबर 

जग से

स्वयं से हो गए हैं

पलक 

चारों बन्द हैं

ज्यों सो गए हैं

जिंदगी के

रूप का

ये भी अमल है।


साथ जीने

साथ मरने 

की कसम ले

बढ़ चले

उस राह पर

प्रण की रसम ले

बसता

हृदय में प्यार 

निर्मल गंग जल है।


शुभमस्तु !


28.10.2025●5.30 आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...