गुरुवार, 13 जून 2019

सात सुर [अतुकान्तिका]

स र ग म के सात सुर,
साथ -साथ सात सुर,
सुर में सुर मिलाते,
नया संगीत सजाते,
श्रवण से हृदय  में-
उतर -उतर जाते,
कभी मेघ मल्हार बन-
धरा पर मेघ बरसाते,
कभी राग दीपक से-
अनजले दीपक जलाते।

स र ग म के ये सात सुर
'सुर '  हैं  'असुर'   नहीं,
स्वर हैं व्यंजनों के
बदलते हुए रूप रंग आकार,
व्यंजनों का रस रीति शृंगार,
जुड़ते हुए ऊपर या नीचे,
कभी आगे कभी पीछे-
सोने में सुहागा हैं,
जो पा ले वही सुभागा है,
अन्यथा अभागा है।

माला के अलग -अलग धागे,
पिरोते मोतियों को विराजे,
अलग -अलग  रंग,
अलग ही सुगन्ध,
कभी तीव्र कभी मंद,
अप्रतिबन्ध  रूप स्वच्छन्द।

स र ग म में सात सुर,
संगीत के प्राण,
साहित्य और कला के त्राण,
न कहीं पुच्छ न विषाण,
होंगे भी क्यों ?
मानवता का सुसन्देश,
मानवों की पावन धरा पर,
गुंजायमान माँ शारदा की
वीणा का मधुर स्वर,
सत्यं शिवम सुंदरम का 
घर -घर  शाश्वत कल रव,
जहाँ सत्य है ,
शिव है ,
और सुंदर है,
वहीं  'शुभम'  है,
सफ़लता का मंदिर है।

💐शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
🦢 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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