सोमवार, 27 अप्रैल 2026

स्वागत है ऋतुराज का [ दोहा ]

 122/2026



[बसंत,ऋतुराज,कामदेव,अमलतास,कचनार]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'    

     

                 सब में एक

मन  में  वन में  बाग में,बिखरा विरुद बसंत।

सुमन खिले  बहु रंग के,महका  हुआ दिगंत ।।

कुहू-कुहू कोकिल करे,कूक -कूक हर ओर।

ऋतु  बसंत  मनभावनी,चुरा  रही मन मोर।।


स्वागत है ऋतुराज  का,अलि दल है रस लीन।

कलियाँ   खिलतीं   बाग में, मुस्का   रही जमीन।।

स्वागत  में   ऋतुराज के , तितली भँवरे   मस्त।

मधुरस     पीते   प्रेम   से,दिन भर रहते व्यस्त।।


कामदेव ऋतुराज  का, अविलग  नेक सुसंग।

विरहिन   तड़पे    ताप से,  तापित  करे अनंग।।

कामदेव    का   काम है,  करना सृष्टि प्रसार।

मन ही मन मंथित   करे,  अविरल  सघन गुबार।।


पीली     चादर   ओढ़कर , छाया  है  चहुँ ओर।

अमलतास मन  खींचता,मन्मथ को झकझोर।।

अमलतास  छवि  देखकर,हँसने लगा गुलाब।

भ्रमरों   का  दल  छा गया,रहा  फूल  को दाब।।


झूम  उठा  कचनार भी, जब आया ऋतुराज।

कलियाँ बैंगन-सी खिलीं,सजा हुआ नव साज।।

अपनी ही छवि के लिए, ख्यात हुआ कचनार।

लगा   बैंजनी  शीश  पर, मुकुट   सजाए मार।। 


               एक में सब

अमलतास कचनार सँग,महक रहा ऋतुराज।

कामदेव  सोया   जगा, वर बसंत का   साज।।


शुभमस्तु,

01.04.2026 ◆4.30 आ०मा०

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