रविवार, 31 मई 2026

लाज भरी तव दृग की छवियाँ [ सजल ]

 174/2026



समांत          : इयाँ

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       :16.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पूछ    रहीं    दुल्हन    से  सखियाँ।

लाज भरीं  तव  दृग की   छवियाँ।।


ब्याह  हुआ   पति-गृह    से  लौटीं।

श्वसुरालय    की   कैसी   गलियाँ।।


साथ  मिला  साजन  का अनुपम।

लगी  न होंगीं पल   की   सदियाँ।।


पायल   मौन    करधनी  मुखरित।

गूँज उठीं   होंगीं   मधु    ध्वनियाँ।।


रात-रात   भर   सो   न सकीं तुम।

करती थीं क्या पति से   बतियाँ??


फूट  रहे       हैं  मन    में      लड्डू।

हमको  भी जतलाओ   खुशियाँ।।


'शुभम्'  बताओ अनुभव   हमको।

लिखती हो क्या अब भी चिठियाँ।।


शुभमस्तु,


31.05.2026 ◆10.30 प०मा०

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