170/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
निर्भय
चावल चुंगें
हथेली पर बैठी भोली गौरैया।
पहले मुझको
पहले मुझको
होड़ लगी है
बैठे मौन
चिड़े दो लेकिन
सभी सगी हैं
पहले उनको
खा लेने दें
यही सोच बोली गौरैया।
भाँप चुकी हैं
खतरा उनको
नेंक नहीं है
चह -चह करतीं
बतियाती
निज नीड़ नहीं है
जलदी में टपकाती दाना
धरती पर
हमजोली गौरैया।
मन की तह में
झाँक लिया तो
मिली निडरता
अपना-सा
नर मान लिया
पा गईं सफलता
मस्त उड़ातीं
दावत
भूखी पोली गौरैया।
शुभमस्तु,
19.05.2026◆5.15 आ०मा०
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