रविवार, 31 मई 2026

पूछ रहीं दुल्हन से सखियाँ [ गीतिका ]

 175/2026





©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पूछ    रहीं    दुल्हन    से  सखियाँ।

लाज भरीं  तव  दृग की   छवियाँ।।


ब्याह  हुआ   पति-गृह    से  लौटीं,

श्वसुरालय    की   कैसी   गलियाँ।


साथ  मिला  साजन  का अनुपम,

लगी  न होंगीं पल   की   सदियाँ।


पायल   मौन    करधनी  मुखरित,

गूँज उठीं   होंगीं   मधु    ध्वनियाँ।


रात-रात   भर   सो   न सकीं तुम,

करती थीं क्या पति से   बतियाँ?


फूट  रहे       हैं  मन    में      लड्डू,

हमको  भी जतलाओ   खुशियाँ।


'शुभम्'  बताओ अनुभव   हमको,

लिखती हो क्या अब भी चिठियाँ।


शुभमस्तु,


31.05.2026 ◆10.30 प०मा०

                     ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...