शनिवार, 30 मई 2026

एक नाटक चल रहा है [ गज़ल ]

 167/2026



  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक      नाटक    चल    रहा  है।

ख़ुद की खुदी  को  छल  रहा है।।


मुख  पर   मुखौटे   रोज़   बदले,

ख़्वाब   ख़्याली    पल  रहा  है।


खींचनी    है     नज़र     सबकी,

तू    भाड़   में   क्यों जल रहा है?


तोड़ता      है       एक      कुर्सी,

कोई     पकौड़ी   तल    रहा है।


पेट  में      दाना     न      उसके,

कोई   मलाई     रल    रहा    है।


बाप-  बेटे    में       न     बनती,

हाथ     अपने     मल    रहा  है।


सास     को     बहुएँ    न   चाहें,

पुत्र     भी       बे दिल    रहा है।


शुभमस्तु,


17.05.2026◆1.00आ०मा०

                    ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...