शनिवार, 30 मई 2026

दुनिया ठगी बाज़ार है [ग़ज़ल]

 165/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दुनिया  ठगी  बाज़ार   है।

मीठी   छुरी  तलवार   है।।


बातें   जलेबी-सी     करें,

मीठा  मगर   आकार  है।


सब चाहते  अपना भला,

बाक़ी   सभी  दुतकार है।


गिर जाए   कोई  भाड़ में,

दुनिया में  इतना प्यार  है।


हर इंच  पर  शातिर खड़े,

आबाद     भ्रष्टाचार     है।


बनिया  हुआ हर  आदमी,

करता हुआ   व्यापार   है।


बस  लाभ अपना चाहिए,

इस बात   की  तकरार  है।


गदहे     पंजीरी    खा   रहे,

मह  महकता   गलहार   है।


अपना  नहीं   कोई  'शुभम्',

ये   सोचकर      बेजार   है।


शुभमस्तु,


17.05.2026◆11.45 आ०मा०

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