शनिवार, 12 सितंबर 2020

अत्याधुनिकता की खाज और हिंदी [ लेख ]

 

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✍️लेखक ©


 🌳 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'


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                 हिंदी एक संस्कृति है।भारतीयता के संस्कार का नाम हिंदी है।कालांतर में उसने एक बोली ,भाषा और साहित्य के उच्च स्थान को प्राप्त कर लिया है।वैदिक भाषा 'छांदस' से लेकर संस्कृत, पालि, प्राकृत और अपभ्रंश के अनेक सोपानों को पार करती हुई यह 'हिंदी' के वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुई है।हिंदी की अनेक बोलियों यथा: ब्रजभाषा , अवधी, मैथिली ,भोजपुरी आदि ने बोलियों के स्तर से ऊपर जाकर साहित्य के उच्च आसन को प्राप्त किया।किन्तु मेरठ और हस्तिनापुर के आसपास की ही एक बोली :खड़ीबोली ने आज उच्च साहित्यिक मंच पर अपनी उपस्थिति अंकित कराई है।यह खड़ीबोली हम भारतीयों के गर्व औऱ गौरव की अनुभूति कराने के लिए रष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए एक विशेष माध्यम है।


               समय -समय पर देश की सामाजिक और राजनैतिक उठा -पटक और परिवर्तनों के कारण भाषा में भी परिवर्तन हुए जो आज भी निरन्तर हो रहे हैं।इन परिवर्तनों के कारण हिंदी में उर्दू,अरबी, फारसी, पुर्तगाली,लैटिन, अंग्रेज़ी आदि अनेक भाषाओं के शब्दों का समावेश हुआ और निरन्तर हो रहा है। किसी भाषा की समृद्धि और विकास के लिए नए -नए शब्दों की वृद्धि उचित है ,किन्तु यदि सीमा का अतिक्रमण करते हुए वह मूल भाषा के लिए विकृति बन जाय ,तो यह सर्वथा अनुचित ही है। देश में चल रही पाश्चात्य सभ्यता की होड़ और अपनी सभ्यता और संस्कृति की अनदेखी भाषा औऱ संस्कृति के लिए विशेष घातक है। 


               आज देश की हिंदी भाषी क्षेत्रों की अति अधुनिकाएँ अपने बच्चों को पैदा होते ही अंग्रेज बनाने में जुट जाती हैं। हिंदी बोलना और पढ़ना उनकी दृष्टि में पिछड़ापन है। इसलिए वे अपने बच्चों को अंग्रेज़ी के कुछ शब्द बोलने की आदत डालने में रात-दिन एक करने में लगी हुई हैं।उनको स्वयं न तो ढंग की हिंदी आती है और न अंग्रेज़ी ही। कौवे को क्रो, कुत्ते को डॉग , बिल्ली को कैट, सिखाकर मानने लगती हैं कि वह अंग्रेज बन गया। स्वयं 'लेकिन'  के लिए 'बट' बोलकर बहुत गर्व की अनुभूति उन्हें होती हैं।हिंदी को विकृति की ओर ले जाने का 80प्रतिशत दायित्व इन्हीं अधुनिकाओं का है , अब पतिदेव बेचारे कैसे पीछे रह सकते हैं, इसलिए वे भी सहधर्मिणी के साथ भाषा -शिक्षण -धर्म निभाना अपना परम दायित्व समझते हुए सह -शिक्षक बन जाते हैं। हैड मास्टरनी का दर्जा तो उनसे कोई छीन नहीं सकता, क्योंकि उन्हें ज्यादा अंग्रेज़ी आती है! 


             इन अधुनिकाओं की दृष्टि में यदि उनके बच्चे अंग्रेज़ी में गिटपिट नहीं कर लेंगे ,तब तक उनकी समाज में 'प्रेस्टीज' ही क्या रह जायेगी? उनके लिए हिंदी की खिचड़ी खाना और बच्चों को खिलाना प्रतिष्ठा का विषय है। उन्हें हिंदी आती भी नहीं औऱ घृणा भी करती हैं।इसलिए वे बच्चों से क्विकली ब्रेकफास्ट ईट करने के लिए कहती हैं। ऐसी खिचड़ी देख और सुनकर हँसी भी आती है और आत्मिक कष्ट भी होता है कि देश कहाँ जा रहा है। कुछ लोगों को मेरी इस बात से आपत्ति हो सकती है लेकिन 200 परिवारों का सर्वेक्षण करने के बाद यह बात दावे से कह सकता हूँ कि इस बिंदु पर 80 प्रतिशत अति अधुनिकाएँ ही अग्रणी हैं और फिर नर से भारी नारी।अपने बच्चों को बनाने -बिगाड़ने में जो भूमिका माँ की है ,वह स्थान कोई भी नहीं ले सकता। 


           खाज खुजाने में किसे आनन्द नहीं आता ? हिंदी में लगी हुई अंग्रेज़ी खाज आधुनिकों को बहुत आनन्द की अनुभूति करा रही है।जितना भी खुजाओ उतना आनन्द पाओ।कहावत है :'घर की खांड खुरखुरी लागै......' इसी प्रकार जब नौनिहालों के मुँह से खिचड़ी टपकने लगती है, तो माताओं का सिहाना स्वाभाविक है। देखा -देखी पिताश्री भी खुश हो लेते हैं, कि चलो बच्चे अपनी संस्कृति और भाषा को ठेंगा दिखा रहे हैं। ज्ञानवर्द्धन के लिए किसी भी भाषा को सीखना बुरा नही है। लेकिन अपनी संस्कृति औऱ भाषा को नीचा दिखाकर उसे अपदस्थ करना एक सच्चे नागरिक के लिए निंदनीय है, हेय है , त्याज्य है।जो व्यक्ति अपनी भाषा और संस्कृति का सम्मान करना नहीं जानता ,उसके लिए ऐसे कृत्य शर्मनाक हैं। वे अपनी भाषा,संस्कृति, राष्ट्रीयता ,एकता ,अखण्डता और संगठन के शत्रु हैं। वे सच्चे नागरिक भी नहीं हैं ,तो अच्छे देशभक्त कैसे हो सकते हैं! 


 💐 शुभमस्तु ! 


 12.09.2020 ◆10.00पूर्वाह्न।

आत्मबोध [अतुकान्तिका]


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✍️ शब्दकार©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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इस देह से ही

सदा संदेह है,

यह देह ही तो

आत्मा का गेह है,

किन्तु मानव को

देह से ही नेह है।


आत्मा का निवास

यह पंच भौतिक देह,

उसी आत्मा का

अभिज्ञान है

आत्मबोध,

मैं कौन हूँ?

मैं क्यों हूँ?

मैं क्या हूँ?

किसलिए यहाँ हूँ?


' सो$हं '

जो वह  'परमात्मा' है,

वही तो मैं हूँ,

वही आत्मतत्त्व मैं,

परम आत्मा का अंश,

अंशी वह 

अजर,अमर, शाश्वत।


विराट विश्व में

मेरे आगमन का

लक्ष्य क्या है?

अभिज्ञान उसका,

आत्मबोध का

रहस्यमय शफ़ा है।


कितना सूक्ष्म

और नगण्य मैं,

किन्तु अहंकार के

हस्ती ने

बना दिया है

मुझे भी 

विशाल हाथी,

जो आत्मा को क्या?

अपनी देह को भी

देख और जान नहीं

पाता कभी!


सब अकेले हैं,

कौन किसका?

कौन किसके साथ?

कौन किसका नाथ?

सबका पृथक पाथ?

कहीं कोई वर्ण ,

कोई जात,

काले गोरे रंग,

सवर्ण अवर्ण

ऊँच -नीच छुआछूत,

नहीं समझा

मानुष जीव

पक्षी ,पशु,

जल ,थल ,नभचर,

छोटा बड़े का आहार,

कैसा विचित्र 

आत्माओं का 

अंधी आत्माओं का

संसार!


अहंकार का पर्दा,

विनाश का गर्दा,

जीव बना रहा मुर्दा,

कोई रावण

कोई कंस,

ध्वंश ही ध्वंश,

रँग लिए वसन,

मन वही

बस एक तन,

दीखते उसको

ये स्वजन,

कोई परिजन,

और पराया जन,

पर नहीं दिखा

अपना स्वत्त्व,

परम तत्त्व।


कैसे हो 

औऱ क्यों?

आत्मबोध?

मकड़ी के जाले में,

टंगा हुआ उलटा, 

शीर्षासन करता,

अपने ही अहं में चूर,

फिर हो भी क्यों

कैसा आत्मबोध !


सुअर ,गर्दभ ,श्वान!

वैसा ही इंसान,

क्या मात्र

 देह ही पहचान!

रहा बस 

गोरी त्वचा का ज्ञान।


नहीं पहचाना

मैं कौन हूँ,

कहाँ से आया ?

कहाँ जाना?

क्या यों ही

चलते चले जाना?

क्या करना?

क्या यों ही

जीना मरना ,

फिर कैसा आत्मबोध!


करना ही है

निरन्तर आत्मशोध

यों ही नहीं

बनता है कोई बुद्ध,

जो कर सके

सत्यं,शिवं,

सुंदरम,'शुभम' आत्मबोध।


💐शुभमस्तु !


11.09.2020◆2.00अपराह्न।


गुरुवार, 10 सितंबर 2020

15रु.का कोट और मेरे बाबा [ संस्मरण ]


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✍️ लेखक © 


🧥 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 


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            मेरे पूज्य और प्रातः स्मरणीय बाबा स्व.श्री तोता राम जी स्वतंत्रतता संग्राम सैनानी थे। इसलिए अपने अंतिम समय तक उन्होंने गांधी आश्रम के खादी के धोती, कुर्ता ,टोपी तथा अन्य सभी देहावरण धारण किए ।यहाँ तक कि जूते भी कपड़े के बने हुए ही पहना करते थे। मैं अपने पिता जी की सबसे बड़ी संतान होने के कारण दादी - बाबा का बहुत ही लाड़ला नाती रहा। वे समय -समय पर मेरे लिए भी खादी के कुर्ता -पाजामा बनवा दिया करते थे।जिन्हें पहनने में मुझे बहुत ही अच्छा लगता था।


        उस समय मेरी अवस्था यही कोई 10-11 साल की थी। चौथी कक्षा में पास के ही गाँव की प्राइमरी पाठशाला में पढ़ रहा था। फीस लगती थी मात्र एक आना,जिसे हम इकन्नी बोलते थे,जो कच्ची 1,पक्की 1से लेकर पाँचवीं कक्षा तक इकन्नी ही देनी होती थी। 


          जब जाड़े का समय आया, तो बाबा आगरा गए और मेरे लिए एक ऊन निर्मित कोट लेकर आए। कोट खुले गले का और हलके हरे रंग का था। जब मैंने पहना तो मुझे एक दम सही आया और ऐसा लग रहा था कि टेलर से सिलवा कर लाए हों। उस समय हम सभी बच्चे प्रायः पाजामे ही पहना करते थे। मैंने भी पाजामे पर कुर्ते के ऊपर कोट पहना । बहुत अच्छा लगा और दो -तीन वर्ष तक जाड़े की ऋतु आने पर पहनता। 


          बाबा ने यह भी बताया कि यह कोट गांधी आश्रम से पंद्रह रुपए का आया है। आज पंद्रह रुपए का कोई महत्त्व हो चाहे न हो ,पर उन दिनों में 1963 -64 में उसका जो मूल्य रहा होगा , वह मेरे लिए अनमोल था । उस पंद्रह रुपये के बाबा के हरे कोट के साथ बाबा का असीम लाड़-दुलार जो जुड़ा हुआ था , उससे मैं कभी उऋण नहीं हो सकूँगा। उस कोट का ऊन का एक -एक रेशा उनके लाड़ की कहानी कहते हुए अमर हो गया है। आज मेरे वह पूजनीय बाबा रहे न वह कोट ही रहा,पर उनकी अमर स्मृति का जो बिम्ब मेरे मानस में बना हुआ है , उसे कोई नहीं मिटा सकता। कोई नहीं मिटा सकता।मैं अपने उन प्रातः स्मरणीय बाबा जी को श्रद्धा पूर्वक शतशः नमन करता हूँ।


 💐 शुभममस्तु ! 


 10.09.2020◆12.30 अपराह्न।

ग़ज़ल


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✍️ शब्दकार 

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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भटूरा  है  मगर  साथ छोला नहीं  है।

डोंगा   अभी  एक  खोला  नहीं  है।।


हसीं  नाज़नी औ'  शवाबों का मंज़र,

मेरा   मगर     मन   डोला  नहीं   है।


कानों   ही   कानों   में    होती  हैं   बातें,

खुलकर  अभी   कोई    बोला नहीं है।


ग़लत    कह  रहे    वे  कर - कर इशारे,

सच    की  तराजू    पे   तोला  नहीं है।


चोली  में  जड़े  लाख  सलमा सितारे,

शौक  से  जो   सजाए   चोला नहीं है।


चले   आए   बाज़ार   में  क्या खरीदें,

मगर  साथ   में    एक   झोला नहीं है।


बनाते  हैं   बातें    गला  फाड़ सौ-सौ,

तहजीबों  का बचा  एक तोला नहीं है।


झूठी    गपें    हाँकने   में   वे माहिर,

जुबाँ   में    कभी   रस   घोला नहीं है।


दिखने  में लगता  है   चिकना शरीफा ,

'शुभम' आदमी   आज  भोला नहीं है।


💐 शुभमस्तु !


10.09.2020 ◆4.30 अपराह्न।


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पितर-अशीष:तथास्तु [अतुकान्तिका]


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✍️ शब्दकार©

🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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श्रद्धा के

ये कुछ सुमन,

आपके लिए

किए हैं अर्पण,

जहाँ भी हो

जिस लोक में

जिस रूप में

जानते हम नहीं,

बस स्वीकार करें

ये श्रद्धा -सुमन।


हे पितर!

आपका ही

पुण्य -प्रताप,

हमारे जीवन का

जाप,

करते रहें 

हम स्मरण

आपका,

 ये कुछ

 सुमन अर्पण।


आप 

आजीवन तपे,

रात -दिन

जिए खपे,

आपने 

जो भी

दिया है हमें,

वही है पाथेय 

भी हमें,

इस जमीं पर,

नहीं होंगे

हम उऋण आपसे।


सूक्ष्म देहधारी 

 हे पूज्य पितर!

रहे हो  

तुम स्वच्छन्द 

नील गगन में विचर,

मध्याह्न में

और निशीथ के समय,

कहते हुए

कुछ शुभ शब्द 

उच्चरण,

नहीं हम सुनते,

ध्वनि जो

गुंजरित हो रही,

बस यही -

तथास्तु !

तथास्तु!!

शुभमस्तु !

शुभमस्तु !!


💐 शुभमस्तु !


10.09.2020◆11.00पूर्वाह्न।

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

बया बुनकर [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🎋 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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बया  अनौखा  पक्षी  बुनकर।

नीड़ बनाता तृण चुन चुनकर।


ताड़   सरीखे    पौधे  चुनता।

जिन पर नीड़ सुघरतम बुनता

पानी हो समीप  सरि सरवर।

बया अनौखा  पक्षी बुनकर।।


पत्ती , तिनके   नर  ही लाता।

दौड़- दौड़कर नीड़ सजाता।।

बुला रहा  मादा को मधुस्वर।

बया अनौखा  पक्षी बुनकर ।।


एक नहीं दस - बीस  घोंसले।

बया  कीर के   बड़े  हौंसले।।

झुंड बना रहते सब मिलकर।

बया  अनौखा पक्षी बुनकर।।


ऊपर   सँकरा    नीचे  गोला।

शयन- कक्ष गहरा  है पोला।।

द्वार सजाया  सुंदर सुखकर।

बया   अनौखा पक्षी बुनकर।।


बया     दूधिया     अंडे  देती ।

सत्रह दिन में   वह  से लेती।।

घोंघा  ,तितली   देते  खगवर।

बया अनौखा  पक्षी बुनकर।।


मिट्टी  में   जुगनू  चिपकाता।

हरी   रौशनी   से चमकाता।।

अभियंता पक्षी   यह नटवर।

बया अनौखा पक्षी  बुनकर।।


सोन  चिरैया  इसको कहते।

पीले   पंखों   में    ये रहते।।

मादा का रँग नर से कमतर।

बया अनौखा पक्षी बुनकर।।


 भोजन , पानी और  सुरक्षा।

परभक्षी  से भी   हो   रक्षा।।

खाते अन्न-कणों को चुनकर।

बया अनौखा पक्षी बुनकर।।


झुंड    बनाकर    रहते   सारे।

नीर  सरोवर  नदी   किनारे।।

'शुभम' नीड़ है सबसे  सुंदर।

बया  अनौखा पक्षी बुनकर।।


💐 शुभमस्तु  !


08.09.2020◆12.15अपराह्न।

भोर [ मुक्तक ]


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✍️ शब्दकार ©

🌄 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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रात  बीती  सघन  कीर  का शोर  है,

नाचता  है  मगन  बाग  में मोर  है,

पुष्प-कलिका चटकने लगी हैं 'शुभम',

हो  गया  गाँव  में  भावता भोर   है।।


खुल गए गए हैं नयन ईश से डोर  है,

उल्लू   बैठा  हुआ  नीड़  में  बोर   है,

मंदिरों   में    टनटना     रहीं घंटियाँ,

देख लो जी 'शुभम'  हो गया भोर  है।।


सरसराती है  हवा    धूप  का  जोर    है,

छेड़ती  रवि - किरण  चाँद कमजोर है,

सरिता  में उठा  नाद कलकल 'शुभम',

शरद   ऋतु  का सुहाना  शिवं भोर   है।।


तेरी   आँखों   में   बैठा   हुआ चोर    है,

शर्माती   झिझकती  कजल- कोर  है,

रात  की बात कब तक छिपाए  सखी,

अब  तो  हो  ही गया गाँव का भोर   है।।


आसमा   में  घटाएँ  गर्ज घनघोर   है,

चमकती  बिजलियाँ रोर का  शोर है,

भादों  सावन की वर्षा भरे ताल  सर,

अभी  तो   'शुभम'   सोहता  भोर   है।।


💐 शभमस्तु !


08.09.2020◆10.00पूर्वाह्न।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...