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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
ऊपर से नीचे गया, कहलाया अवतार।
राम कृष्ण या बुद्ध हों,धरती पर उपहार।।
मूल रूप हरि विष्णु हैं, त्रेता युग में राम।
द्वापर में हैं कृष्ण वे,मथुरा में घनश्याम।।
जब-जब बढ़ता पाप का,धरती पर अति भार।
प्रभु तब मानव रूप में, धरते हैं अवतार।।
मानव की लीला करें, नित्य रचाएँ रास।
राधा के घनश्याम जी, लें अवतार सहास।।
संत विवेकानंद का, अवतारी शुभ रूप।
दिव्य शुभद नर देह में ,बना मनुज का भूप।।
भक्तों के भगवान हैं, रक्षक प्राणाधार।
लेते हैं अवतार वे, बदल देह आकार।।
महापुरुष या नारियाँ, कहते नहीं महान।
लेते हैं अवतार वे, करें प्रेम रस दान।।
प्रतिभाएँ वे और ही, जिनका रूप विचित्र।
चुनते वे अवतार को, मात-पिता सचरित्र।।
मथुरा में थीं देवकी, और उधर वसुदेव।
चयन किया अवतार को,जन्माधार तवैव।।
कौशल्या के धाम में, लिया राम अवतार।
दशरथ जीवन धन्य है,कर्मों का उपहार।।
ईश्वर के अवतार का,एक अलग इतिहास।
युग-युग में तद रूप वे,कभी यमक अनुप्रास।
शुभमस्तु,
11.06.2026◆11.00आ०मा०
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