बुधवार, 17 जून 2026

कहता कौन नहीं अब रावण [ गीतिका ]

 192/2026





©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कहता    कौन  नहीं  अब  रावण।

त्रस्त   दुखी   रावण   से जनगण।।


समझ   रहा   मैं    ही   बलशाली,

काँप रहा अवनी  का  कण-कण।


ध्वंश  तभी    होगा    रावण   का,

जब होगा  फिर    राम-अवतरण।


दृष्टि  सभी  की   लगी   उधर   ही,

हत  मानवता    रिसते   हैं    व्रण।


नहीं    अस्मिता    की  कुछ चिंता,

मात्र     चाहता     जग-आकर्षण।


मानवता    का     क्षय   होता    है,

दानवता  से   कंपित    तृण-तृण।


'शुभम्'  मूढ़  नर अभी सँभल जा,

क्षीण    हो  रहा  तेरा    क्षण-क्षण।


शुभमस्तु,


15.06.2026◆7.45 आ०मा०

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