192/2026
©शब्दकार
डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कहता कौन नहीं अब रावण।
त्रस्त दुखी रावण से जनगण।।
समझ रहा मैं ही बलशाली,
काँप रहा अवनी का कण-कण।
ध्वंश तभी होगा रावण का,
जब होगा फिर राम-अवतरण।
दृष्टि सभी की लगी उधर ही,
हत मानवता रिसते हैं व्रण।
नहीं अस्मिता की कुछ चिंता,
मात्र चाहता जग-आकर्षण।
मानवता का क्षय होता है,
दानवता से कंपित तृण-तृण।
'शुभम्' मूढ़ नर अभी सँभल जा,
क्षीण हो रहा तेरा क्षण-क्षण।
शुभमस्तु,
15.06.2026◆7.45 आ०मा०
◆◆◆
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें