बुधवार, 17 जून 2026

त्रस्त दुखी रावण से जनगण [ सजल ]

 191/2026



समांत          : अण

पदांत           :अपदांत

मात्राभार      : 16.

मात्रा पतन    :शून्य


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कहता    कौन  नहीं  अब  रावण।

त्रस्त   दुखी   रावण   से जनगण।।


समझ   रहा   मैं    ही   बलशाली।

काँप रहा अवनी  का  कण-कण।।


ध्वंश  तभी    होगा    रावण   का।

जब होगा  फिर    राम-अवतरण।।


दृष्टि  सभी  की   लगी   उधर   ही।

हत  मानवता    रिसते   हैं    व्रण।।


नहीं    अस्मिता    की  कुछ चिंता।

मात्र     चाहता     जग-आकर्षण।।


मानवता    का     क्षय   होता    है।

दानवता  से   कंपित    तृण-तृण।।


'शुभम्'  मूढ़  नर अभी सँभल जा।

क्षीण    हो  रहा  तेरा    क्षण-क्षण।।


शुभमस्तु,


15.06.2026◆7.45 आ०मा०

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