191/2026
समांत : अण
पदांत :अपदांत
मात्राभार : 16.
मात्रा पतन :शून्य
©शब्दकार
डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कहता कौन नहीं अब रावण।
त्रस्त दुखी रावण से जनगण।।
समझ रहा मैं ही बलशाली।
काँप रहा अवनी का कण-कण।।
ध्वंश तभी होगा रावण का।
जब होगा फिर राम-अवतरण।।
दृष्टि सभी की लगी उधर ही।
हत मानवता रिसते हैं व्रण।।
नहीं अस्मिता की कुछ चिंता।
मात्र चाहता जग-आकर्षण।।
मानवता का क्षय होता है।
दानवता से कंपित तृण-तृण।।
'शुभम्' मूढ़ नर अभी सँभल जा।
क्षीण हो रहा तेरा क्षण-क्षण।।
शुभमस्तु,
15.06.2026◆7.45 आ०मा०
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