बुधवार, 10 जून 2026

दूर-दूर तक वीराना है [ गीत ]

 182/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दूर -दूर तक

वीराना है

तपती धरा अपार।


तपे गगन में

ऊपर सूरज

बरस रही है आग

सूखे तरुवर

एक न पल्लव

शून्य सकल अनुराग

फटे नहीं 

बस होंठ धरा के

देह हो गई छार।


दिखती नहीं

एक भी चिड़िया

दिखे न कोई ढोर

नहीं कूकती

कोकिल तरु में

एक नहीं खग मोर

जेठ मास की

तपन भयंकर

मनुज गया है हार।


आशाओं पर

जीवन रक्षित

जीता है इंसान

लगे झड़ी 

पावस की मनहर

होगा सजल विहान

अमराई में

कोकिल बोले

खिले नील कचनार।


भर जाएँगे

ताल-तलैया

नदिया करे किलोल

टर्र -टर्र फिर

मेढक बोलें

रजनी में रस घोल

आषाढ़ी दौंगरे 

लुटाएँ

जन-जन को रस प्यार।


शुभमस्तु,


09.06.2026◆6.15 आ०मा०

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