बुधवार, 17 जून 2026

अधीर [ कुंडलिया ]

 186/2026


                     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

होते    रहें  अधीर   जो,करते    हैं   जब काम।

मिले   नहीं   साफल्य  तो, हो   जाते बदनाम।।

हो   जाते  बदनाम,  सुचिन्तन   उन्हें न भाता।

हड़बड़   का हर  काम, भँवर के बीच डुबाता।।

'शुभम्'   अंत    में   लोग, वही  पछताते रोते।

पूर्व   सोच  से   हीन, काम   जिनके सब होते।।


                         -2-

पहले  मन में  धीर   धर, खूब  सोचिए आप।

मत  अधीर होना कभी,  लेश न हो     संताप।।

लेश   न हो   संताप,  समझ कर कदम बढ़ाएँ।

मरे   न   चींटी   एक, पाँव   कुछ    ऐसे लाएँ।।

'शुभम्'   सफलता  पूर्ण,  करें नहले पर दहले।

धरें   धार   में   पाँव,  नदी   के   तट पर पहले।।


                         -3-

जिसका   हृदय  अधीर   हो,करे   न अच्छा काम।

खोता   स्वयं  विवेक   को, सुबह   न देखे    शाम।।

सुबह    न   देखे     शाम,  हड़बड़ी   सदा  बुरी   है।

होता     काम    तमाम,   काटती  वही  छुरी    है।।

'शुभम्'   अशुभ    परिणाम,सदा होता है रिस  का।

विस्मृत करे   न राम,सुफल मिलता शुभ जिसका।।


                          -4-

कछुआ   सँग  खरगोश की,हुई  एक दिन   दौड़।

धीरज में कछुआ चला, व्यथित शशक ज्यों बौड़।।

व्यथित शशक   ज्यों बौड़,थका सोया  तरु-छाया।

उधर   न   हुआ  अधीर, वही   कच्छप सुथराया।

'शुभम्'   प्राप्त  गंतव्य,  वही   था बनता अगुआ।

पिछड़   गया   खरगोश,  धीर  धर जीता कछुआ।।


                         -5-

मानव     की    गुणराशि   में, धीरज  है अनमोल।

रहता    रत    सद्धर्म   में,    नहीं  मुखौटा-खोल।।

नहीं      मुखौटा-खोल,   क्रोध     अज्ञान नसाए।

चींटी      चढ़े    पहाड़,    शृंग     पर   शोभा पाए।। 

'शुभम्'   रहे     सविवेक,   नहीं बनता नर दानव।

दुर्गुण     एक    अधीर,    बनाता  हमें  न  मानव।।


शुभमस्तु,


12.06.2026◆9.15 आ०मा०

                     ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...