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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
होते रहें अधीर जो,करते हैं जब काम।
मिले नहीं साफल्य तो, हो जाते बदनाम।।
हो जाते बदनाम, सुचिन्तन उन्हें न भाता।
हड़बड़ का हर काम, भँवर के बीच डुबाता।।
'शुभम्' अंत में लोग, वही पछताते रोते।
पूर्व सोच से हीन, काम जिनके सब होते।।
-2-
पहले मन में धीर धर, खूब सोचिए आप।
मत अधीर होना कभी, लेश न हो संताप।।
लेश न हो संताप, समझ कर कदम बढ़ाएँ।
मरे न चींटी एक, पाँव कुछ ऐसे लाएँ।।
'शुभम्' सफलता पूर्ण, करें नहले पर दहले।
धरें धार में पाँव, नदी के तट पर पहले।।
-3-
जिसका हृदय अधीर हो,करे न अच्छा काम।
खोता स्वयं विवेक को, सुबह न देखे शाम।।
सुबह न देखे शाम, हड़बड़ी सदा बुरी है।
होता काम तमाम, काटती वही छुरी है।।
'शुभम्' अशुभ परिणाम,सदा होता है रिस का।
विस्मृत करे न राम,सुफल मिलता शुभ जिसका।।
-4-
कछुआ सँग खरगोश की,हुई एक दिन दौड़।
धीरज में कछुआ चला, व्यथित शशक ज्यों बौड़।।
व्यथित शशक ज्यों बौड़,थका सोया तरु-छाया।
उधर न हुआ अधीर, वही कच्छप सुथराया।
'शुभम्' प्राप्त गंतव्य, वही था बनता अगुआ।
पिछड़ गया खरगोश, धीर धर जीता कछुआ।।
-5-
मानव की गुणराशि में, धीरज है अनमोल।
रहता रत सद्धर्म में, नहीं मुखौटा-खोल।।
नहीं मुखौटा-खोल, क्रोध अज्ञान नसाए।
चींटी चढ़े पहाड़, शृंग पर शोभा पाए।।
'शुभम्' रहे सविवेक, नहीं बनता नर दानव।
दुर्गुण एक अधीर, बनाता हमें न मानव।।
शुभमस्तु,
12.06.2026◆9.15 आ०मा०
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बुधवार, 17 जून 2026
अधीर [ कुंडलिया ]
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