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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
दुनिया बड़ी निराली आली।
कहीं लाल पीली या काली।।
दिन में होता खूब उजेरा।
रात अँधेरी सुखद सवेरा।।
लदी हरे पल्लव से डाली।
दुनिया बड़ी निराली आली।।
कलकल कर बहती है सरिता।
लगती है धरती की कविता।।
टपकें छप्पर बहें पनाली।
दुनिया बड़ी निराली आली।।
आसमान में उड़ें कबूतर।
मोर बाग में, करें भेक टर।।
भरी बतासों से नभ - थाली।
दुनिया बड़ी निराली आली।।
ऊँचे पर्वत गहरे सागर।
उथली पोखर ताल सरोवर।।
वर्षा कभी प्रभंजन वाली।
दुनिया बड़ी निराली आली।।
पकी फसल के खेत खड़े हैं।
तरबूजे हो गए बड़े हैं।।
'शुभम्' बजाओ मिलकर ताली।
दुनिया बड़ी निराली आली।।
शुभमस्तु,
14.06.2026◆10.45 आ०मा०
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