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[नदी,ताल,पोखर,कुआँ, बाउली ]
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
चली नदी पितु-गेह से,गिरिवर एक विशाल।
सागर प्रीतम से मिली, मात्र वही ससुराल।।
आया जब आषाढ़ तो,गिरे दौंगरा खूब।
प्यासी नदी प्रसन्न है, हरी हो गई दूब।।
आया सावन झूम के, हर्षित पोखर ताल।
जीव-जंतु सब मग्न हैं, अब तक थे बेहाल।।
ताल-तलैया भर गए, बरसे मेघ अषाढ़।
प्रेमालिंगित तरु-लता, करते नेह प्रगाढ़।।
आज गधे की पीठ पर,कपड़े घर के लाद।
पोखर को धोबी चले, करके खाली नाद।।
टर्र-टर्र मेढक करें, पोखर में सब रात।
सावन की झड़ियाँ लगीं,ऋतु आई बरसात।।
कुआँ शेष बस नाम के,रहा न जिनमें नीर।
नर-नारी आते नहीं,होकर कभी अधीर।।
भरती थीं जल नारियाँ, कुआँ सभी आबाद।
हैंड-पंप जब से लगे, बिसर गए हैं याद।।
विदा हुए हैं कूप सब, नहीं बाउली शेष।
सब-मर्सीबिल लग गए, ट्यूबवैल के वेष।।
किले पुराने शेष हैं, जहाँ मिले इतिहास।
गहन बाउली की वहीं,बची हुई है आस।।
एक में सब
नदी ताल पोखर भरे, आया सावन मास।
कुआँ बाउली आज भी,लगा रहे हैं आस।।
शुभमस्तु,
03.06.2026◆5.30आ०मा०
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