178/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
लड़ते हो अधिकार के लिए
अपना कर्तव्य क्यों भूले हो!
करणीय भी याद रखो
तुम सामाजिक नहीं, वनैले हो।
अपने पेट की चिंता
अपनी देह की ही खबर!
दूसरों को भी देखो
झाँक लो थोड़ा बाहर!
तुम्हें भी कुछ करना है
समाज के लिए
देश के लिए
कहाँ सोए पड़े हो बेखबर !
भर लेते हैं अपना उदर
गली के कुत्ते भी,
घूरे पर उग आते हैं
स्वत: कुकुरमुत्ते भी,
सोच लो क्या तुम
कुकुरमुत्ते हो,
जो अनायास ही
किसी घूरे पर उगते हो !
कोई भी न जानेगा तुम्हें
न निहारेगा तुम्हारी ओर
खड़े-खड़े घूर पर
मुरझा जाओगे,
चरते- विचरते हुए
किसी गधे की
लातों से कुचल जाओगे!
जाग जाओ आंखें खोलो
अपना रुख बाहर भी मोड़ो
करणीय को पहचानो
सत्त्वहीन कुकुरुमत्ता न बनो
अपने घूर पर इतना न तनो
अधिकार से पहले
कर्तव्य को जानो।
शुभमस्तु,
05.06.2026◆5.30 आ०मा०
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