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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कटे-फटे को सीती हूँ।
मैं परहित में जीती हूँ।।
सभी मुझे सूई कहते हैं।
वस्त्र नए सिलते रहते हैं।।
धागे के बिन रीती हूँ।
कटे-फटे को सीती हूँ।।
कच-कच कैंची जिसे काटती।
खण्ड-खण्ड में वस्त्र बाँटती।।
करती मैं मनचीती हूँ।
कटे-फटे को सीती हूँ।।
चुभकर नहीं कष्ट मैं देती।
करती मदद हो सके जेती।।
कहती मैं अपबीती हूँ।
कटे-फटे को सीती हूँ।।
चुप -चुप चलकर बढ़ती रहती।
नहीं प्रशंसा अपनी कहती।।
कड़वी मधुर न फीकी हूँ।
कटे-फटे को सीती हूँ।।
सीखा मैंने नहीं बाँटना।
कैंची जैसा कभी काटना।।
अपने ऑंसू पीती हूँ।
कटे-फटे को सीती हूँ।।
शुभमस्तु,
14.06.2026 ◆3,.30 प०मा०
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