बुधवार, 17 जून 2026

कटे -फटे को सीती हूँ [ बालगीत ]

 189/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कटे-फटे        को      सीती      हूँ।

मैं    परहित    में      जीती      हूँ।।


सभी    मुझे     सूई     कहते    हैं।

वस्त्र  नए     सिलते     रहते    हैं।।

धागे  के      बिन      रीती        हूँ।

कटे-फटे         को      सीती    हूँ।।


कच-कच   कैंची    जिसे   काटती।

खण्ड-खण्ड    में   वस्त्र   बाँटती।।

करती      मैं       मनचीती       हूँ।

कटे-फटे       को      सीती      हूँ।।


चुभकर  नहीं      कष्ट     मैं   देती।

करती  मदद     हो    सके   जेती।।

कहती      मैं     अपबीती        हूँ।

कटे-फटे       को      सीती      हूँ।।


चुप -चुप   चलकर  बढ़ती  रहती।

नहीं प्रशंसा     अपनी     कहती।।

कड़वी  मधुर     न    फीकी    हूँ।

कटे-फटे      को     सीती      हूँ।।


सीखा     मैंने      नहीं      बाँटना।

कैंची  जैसा      कभी     काटना।।

अपने      ऑंसू        पीती      हूँ।

कटे-फटे        को     सीती     हूँ।।


शुभमस्तु,


14.06.2026 ◆3,.30 प०मा०

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