बुधवार, 17 जून 2026

प्यास ढूंढ लेती पानी को [ गीत ]

 193/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप शुभम्'


प्यास ढूँढ़ लेती 

पानी को 

जिजीविषा की बात।


कुँए बाबली

बहुत बनाए

खोजे सरिता सागर

कहाँ-कहाँ

मानव ने ढूँढ़ा

पानी  लेकर गागर

बीहड़ वन के

पत्थर में भी

रुका  नहीं मनुजात।


खेल रही

खतरों से बाला

बीहड़ बीच अधीर

लिए घड़ा 

भरती जल शीतल

नहीं नदी का तीर

भयाक्रांत 

एकांत शून्य में

दिन की करता रात।


नहीं साथ में 

सखी सहेली

फिर भी चल निर्बाध

मंजिल पाई है

बाला ने

कठिन साधना साध

मन में है

संतोष बड़ा ही

शिथिल नहीं मन गात।


शुभमस्तु,


16.06.2026◆2.00 प०मा०

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