187/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
गाय भैंस बकरी की तरह
बँधे हुए हो खूँटों से,
किसी पार्टी के
किसी नेता के
किसी धर्म के
किसी बेशर्म के ,
तुम्हारा वजूद क्या है !
एक पालतू ढोर भर।
तुम स्वतंत्र नहीं
परतंत्र हो,
किसी के रिमोट से
चलने वाले यंत्र हो,
पिछलग्गू बने हुए
भ्रमित भग्न तंत्र हो।
आजीवन किसी खूँटे से
बँधे रहोगे
अथवा खूँटे बदलने में
जिंदगी बिता दोगे
अपने कब होंगे?
इस देश में खूँटों की
भरमार है,
एक नहीं
ये हजारों हज़ार हैं,
किसी खूँटे का नाम ले दूँ तो
मुझे ही विद्रोही करार दोगे,
विधर्मी कह पुकारोगे,
अपने खूँटे को खुद ही पहचानो
और अपने खूँटे खुद बनो।
आसान है आम आदमी का
किसी खूँटे से बंध जाना,
आसान नहीं अपना खूँटा
खुद गाड़ पाना,
इसलिए लोग दूसरों के पीछे
झंडे बैनर लिए चल पड़े हैं,
राजनेताओं दलों और धर्मों के
खूँटों से बँधे खड़े हैं।
शुभमस्तु,
13.06.2026 ◆10.00आ०मा०
◆◆◆
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें