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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
मिटा अँधेरे मन के काले।
बंद पड़े खोलो सब ताले।।
निज मन में उज्जवलता भर लो,
हटें तमस के बढ़ते जाले।
मन की हर निर्मलता कहती,
गीत प्रेम के सस्वर गा ले।
सफल वही होता जीवन में,
कठिन परिस्थिति में जो ढाले।
नब्ज समय की जान मुसाफिर,
नहीं पड़ेंगे कड़े कसाले।
जानें कौन पराया - अपना,
मत सबको निज मित्र बना ले।
'शुभम्' आज का काम आज कर,
नहीं व्यर्थ में कल पर टाले।
शुभमस्तु,
08.06.2026◆6.15 आ०मा०
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