सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

क्यारी में पाटल खिले [ सजल]

 082/2026


  

समांत          : ईर

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आहट विरल  वसंत  की,रँगे  हुए   निज चीर।

तन -मन वन -वन झूमती,सर सरिता के तीर।।


अमराई    में   गूँजते,   कुहू-कुहू     के  बोल।

विरहिन   बाट  निहारती,टिके न  उर में धीर।।


क्यारी    में   पाटल   खिले,वन  में टेसू  लाल।

मह-मह-मह  गेंदा करे,  सरसों   सरस अमीर।।


सरर-सरर चलती  हवा,गलन  भरी दिन-रात।

अरहर  रह-रह  झूमती, उड़ता  लाल अबीर।।


फगुनाहट  घुलने  लगी, जड़-चेतन के   बीच।

डफ-ढोलक की गूँज में,मस्त   हुए  नर वीर।।


दिन   होली  के  आ गए,बालक   करें धमाल।

उड़ता रंग   गुलाल   का,महका विरल उशीर।।


'शुभम्' गंध  मलयानिली,तन-मन के हर पोर।

काम-बाण   नित  बेधती,जगा  हृदय में पीर।।


शुभमस्तु,


09.02.2026◆7.45 आ०मा०

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