083/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
आहट विरल वसंत की,रँगे हुए निज चीर।
तन -मन वन -वन झूमती,सर सरिता के तीर।।
अमराई में गूँजते, कुहू-कुहू के बोल,
विरहिन बाट निहारती,टिके न उर में धीर।।
क्यारी में पाटल खिले,वन में टेसू लाल,
मह-मह-मह गेंदा करे, सरसों सरस अमीर।
सरर-सरर चलती हवा,गलन भरी दिन-रात,
अरहर रह-रह झूमती, उड़ता लाल अबीर।
फगुनाहट घुलने लगी, जड़-चेतन के बीच,
डफ-ढोलक की गूँज में,मस्त हुए नर वीर।
दिन होली के आ गए,बालक करें धमाल,
उड़ता रंग गुलाल का,महका विरल उशीर।
'शुभम्' गंध मलयानिली,तन-मन के हर पोर,
काम-बाण नित बेधती,जगा हृदय में पीर।
शुभमस्तु,
09.02.2026◆7.45 आ०मा०
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