सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

आहट विरल वसंत की [ दोहा गीतिका ]

 083/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आहट विरल  वसंत  की,रँगे  हुए   निज चीर।

तन -मन वन -वन झूमती,सर सरिता के तीर।।


अमराई    में   गूँजते,   कुहू-कुहू     के  बोल,

विरहिन   बाट  निहारती,टिके न उर में धीर।।


क्यारी    में   पाटल   खिले,वन  में टेसू  लाल,

मह-मह-मह  गेंदा करे,  सरसों   सरस अमीर।


सरर-सरर चलती  हवा,गलन  भरी दिन-रात,

अरहर  रह-रह  झूमती, उड़ता  लाल अबीर।


फगुनाहट  घुलने  लगी, जड़-चेतन के   बीच,

डफ-ढोलक की गूँज में,मस्त   हुए  नर वीर।


दिन   होली  के  आ गए,बालक   करें धमाल,

उड़ता रंग   गुलाल   का,महका विरल उशीर।


'शुभम्' गंध  मलयानिली,तन-मन के हर पोर,

काम-बाण   नित  बेधती,जगा  हृदय में पीर।


शुभमस्तु,


09.02.2026◆7.45 आ०मा०

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