सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

कांति कामिनी काय की [ दोहा ]

 081/2026


   

[कांति,चमक,आभा,प्रभा,सुषमा]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                 सब में एक


कांति कामिनी काय की,करती क्रमिक कमाल।

दो  दृग  से  उर  में   धँसे,  भरती   हुई उछाल।।

कांति बिना इस रूप का,जीवन में क्या मोल।

भ्रमर  झूमते  शाख  पर,मधुरस  चखें अडोल।।


चमक बिना   चंदा   नहीं, नहीं चंद्रिका   चारु।

जीव     सभी   हैं  चाहते, चमक बिखेरे आरु।।

तड़ित   कौंधती   मेघ में,लिए चमक का  तेज।

कंपित उर   नर-नारि  के,निज को रखें सहेज।।


यौवन   की आभा   नई,  भरती ओज अपार।

तन-मन  में नव जोश का, करती सघन प्रसार।।

आभा   से  आकृष्ट   हो, आतीं तितली   पास।

महक  रहे   उद्यान   में,अनगिन   सुमन सहास।।


प्रभा   नई   आकाश में,उषः काल की दिव्य।

प्राची   का      शृंगार   कर,    दर्शाती मंतव्य।।

सौर प्रभा   मंडल  नया,भरता दिव्य प्रकाश।

उषा  न  जाती साथ में, दिनकर नहीं निराश।।


सुषमा सज्जित कामिनी,यौवन का नव  रंग।

आकर्षित   नर   को   करे,भरता हृदय उमंग।। 

सुषमा में  उद्यान  की,भ्रमित हुआ मन  मोर।

नाच उठा   प्रमुदित   बड़ा,बिना  मचाए शोर।।


                 एक में सब


कांति चमक आभा प्रभा,सुषमा के सब नाम।

जैसी   भी   हो भावना, करें  सकल निज काम।।


शुभमस्तु,


08.02.2026◆9.45आ०मा०

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