266/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
देह की गैल से
दिल का सफर
राह रपटीली हैं।
आँख से
आँख की
मौन बतियाँ हुईं
गिर गए
नेत्र- अंचल
कहानियाँ नई
गुलाबी
कपोलों की
रंगत सजीली है।
पहली ही नजर
ढह गया है कहर
क्या करें क्या कहें
चैन आए नहीं
कोई भाए नहीं
कष्ट कैसे सहें
दर्द दिल में बसा
देख जग ये हँसा
अँखियाँ पनीली हैं।
अनजाना सफर
चल पड़ा इस कदर
ज्ञात मंजिल नहीं
हाथ में हाथ है
अजनबी साथ है
पहुँचेंगे कहीं
डूबती नाव को
एक तिनका मिला
नीम चीनी है।
शुभमस्तु,
20.08.2026◆ 12.15 प०मा०
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