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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
बख्शवानी थीं नमाजें ,पड़ गए रोज़े गले।
रात-दिन बढ़तीं न खाजें,जदपि हैं जिंदा भले।।
आदमी को चैन कब है, कोसता है गैर को,
झेलता संकट हजारों , शाम का सूरज ढले।
उठ रहीं अँगुली हजारों, तर्जनी सविरोध की,
जदपि दुःखों में तड़पता, आदमी खुद को छले।
आदमी को देश की, चिंता नहीं पल एक भी,
दूसरे की हर तरक्की, आँख में उसकी खले।
खुदगर्ज़गी का देख आलम, जान का खतरा बढ़ा,
साथ में कोई किसी के, हाथ क्यों थामे चले।
जीभ से पानी टपकता,माल औरों का हड़प,
पाँव से नीचे भले निज,आदमी जन को दले।
जुगुनुओं की ले मशालें,आदमी मैं खोजता,
पर 'शुभम्' पाया न कोई,हवन में कर भी जले।
शुभमस्तु,
17.08.2026◆5.00आ०मा०
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