सोमवार, 24 अगस्त 2026

स्त्री थीं,मिस्त्री हो गईं! [ अतुकांतिका ]

 269/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ऐसे-ऐसे कारीगर

देख लीजिए हर घर-घर

जो बिना ईंट पत्थर

दीवारें खड़ी करें

सुख चैन भी हरें

दिलों के बीच में।


ब्याह जब नहीं हुआ

वे भाई- भाई थे

रक्षक थे सिपाही थे,

हो गया जब ब्याह

तो मिट गई प्रेम की चाह

रात -दिन बस आह!

कारीगर जो आ गई

बँटवारे की

दीवार खड़ी करने,

सुख - शांति को हरने।


बिखर गया ठाठ-बाट

मिट गई टूटी खाट

कारीगर पलंगासीन है

बेलदार बेचारा पति

बड़ा ही दीन है,

ये व्यवस्था आधुनिक है

नवीन है।


सोहनी की सींक-सींक 

बिखर गई,

तो घर को बुहारे कौन,

सभी पड़े  विवश  मौन,

पत्तों से भर गया लॉन।


पूजनीया देवियाँ

दीवार खड़ी करने के लिए

स्त्री थीं,  मिस्त्री हो गईं,

घर की एकता अखंडता

खण्ड- खण्ड  रो रही।


संगठन बिखर गया

जिंदा जन मर गया

घर आँगन अखाड़ा है

गर्मी या जाड़ा है

हर ओर वैमनस्य ने

लाल ध्वज गाड़ा है।


21.08.2026◆8.15आ०मा०

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