सोमवार, 24 अगस्त 2026

जलधर [ कुंडलिया ]

 268/2026


             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

सागर से लेकर चले,जलधर जल-आगार।

सुख देने जल-वृष्टि से,विपुल लुटाने प्यार।।

विपुल लुटाने प्यार,प्यास जीवों की हरते।

मानव जलचर जंतु,विटप की सेवा करते।।

'शुभम्' महत् उपकार,सृष्टि में करें उजागर।

अभिसिंचन के हेतु, नीर के उड़ते सागर।।


                         -2-

महिमा जलधर की सदा,सत्य कहें कवि लोग।

खुले    गगन  में   घूमते, करें    रात-दिन योग।।

करें रात-दिन  योग,  कहें   हम  उनको योगी।

पर उपकारी   मेघ,  नहीं   विचरण   के रोगी।।

'शुभम्'   देव  पर्जन्य,  नहीं   है   इनकी उपमा।

वे   जगती  के  प्राण,करे  जग जलधर महिमा।।


                         -3-

विरही   यक्ष  कुबेर   का,  हुआ प्रिया से दूर।

त्यागी   निज अलकापुरी, दुखी हृदय मजबूर।।

दुखी   हृदय मजबूर,एक दिन जलधर आए।

दिया   विरह-संदेश,  गगन   में   जो मँडराए।।

'शुभम्'  किया स्वीकार, मेघ ने प्रेम बतकही।

सुनी   यक्ष   की   बात,दंड   का भागी विरही।।


                         -4-

बरसे  जलधर   व्योम से,  धारासार अपार।

नदियाँ उमड़ी   वेग   से,करतीं जग उपकार।।

करतीं जग  उपकार,  कहीं हैं बाढ़ भयंकर।

काँवरधारी  लोग,चढ़ाते  जल शिव शंकर।।

'शुभम्'  बहे कुछ  गाँव,नगरवासी सब हरसे।

जलधर के  उपकार, विविध  रूपों  में बरसे।।


                           -5-

गरजे   जलधर   व्योम   में,तड़पी तड़ित अधीर।

रजनी   में     भर     दिव्यता,   बरसाते सन्नीर।।

बरसाते       सन्नीर,     ताल     में   दादुर बोले।

टर्र-टर्र     का   साज,  सजा  अपना  मुख  खोले।।

'शुभम्' मत्स्य साम्राज्य,किसी को क्योंकर बरजे।

श्रावण का   शुभ   मास, गगन  में जलधर गरजे।।


शुभमस्तु,


21.08.2026◆ 6.30आ०मा०

                     ◆●◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...