रविवार, 20 जून 2021

शब्दाधृत सृजन 🎨 [ दोहा ]

 

           (धरती,हरियाली,पर्यावरण,कोरोना,कहर)     

           

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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धरती   हमको   धारती,  मौन धीर    भंडार।

उऋण नहीं होना कभी, बनें न वसुधा-भार।।


धरती  माता  पूज्य  है, आजीवन  हे  मीत।

कष्ट न दे माँ को कभी,बनें न जन विपरीत।


सघन लताएँ कुंज द्रुम, हरियाली के धाम।

देते  वर्षा   मेघ  वे,  शीतल छाया,  घाम।।


नयनों को सुखकर सदा, हरियाली हर वार।

पौधे  रोपें  भूमि   पर,करना नहीं  विचार।।


मन  का  पर्यावरण  भी,पहले कर लें शुद्ध।

ज्ञान तभी बाँटें  यहाँ, बनकर मीत प्रबुद्घ।।


सुधरे पर्यावरण क्यों, जब उर ही  है चोर।

पंच तत्त्व दूषित किए, कैसे हो शुभ भोर।।


कोरोना  के कहर का ,मानव कारण  मूल।

निज  अंतर  देखा  नहीं,देता बाहर  तूल।।


कोरोना  चेतावनी, मनुज-परीक्षा-काल।

पावनता ही रोग की ,एक सुदृढ़ है ढाल।।


कहर-कहर क्यों कह रहा,पहले भीतर झाँक

भीतर जो मैला भरा,उसको तो  नर  आँक।।


आती  हैं  बहु आपदा,कारण मानव  जात।

तूफानों  में  हो  रही, कहरों की  बरसात।।


आओ   धरती   में  भरें हरियाली  भरपूर।

सुधरे  पर्यावरण   भी,क्रूर कहर   हो   दूर।।


🪴 शुभमस्तु  !


०७.०६.२०२१◆९.३० आरोहणम मार्तण्डस्य।

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