बुधवार, 23 जून 2021

राष्ट्र -धर्म कैसे निभे! 🎋🌾 [ दोहा ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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उदर,वंश, निज जाति की,चिंता में रत लोग।

राष्ट्र - धर्म  कैसे  निभे, सबसे पहले   भोग।।


जाति,  वर्ण  के  भेद  से ,  टूट रहा  है  देश।

राष्ट्र - धर्म  कैसे   निभे,दूषित उर - परिवेश।।


योग - दिवस  की  रस्म में,डूब गए  आकंठ।

राष्ट्र -  धर्म  कैसे  निभे, योगी, भोगी,  लंठ।।


एक  दिवस  है  योग  का,शेष सूपड़ा  साफ़।

राष्ट्र - धर्म  कैसे  निभे,रोग न करता  माफ़।।


मैं  ऊँचा   सब  नीच हैं,अहंकार  का  रोग।

राष्ट्र - धर्म कैसे  निभे, खंड - खंड हैं लोग।।


चार  बैल  मति - फूट   में,फूटे उनके भाग।

राष्ट्र - धर्म  कैसे  निभे,डसे जा   रहे  नाग।।


चार  वर्ण  बदरंग  हो,खंड - खंड मति भिन्न।

राष्ट्र - धर्म  कैसे निभे,मति चारों  की खिन्न।।


छिलका  लिपटा  संतरा,बाहर से   है एक।

राष्ट्र-धर्म कैसे निभे, फाँकें भिन्न   अनेक।।


टर्र - टर्र  सबकी  पृथक, नहीं एक  संगीत।

राष्ट्र - धर्म कैसे निभे,मिले न मन का मीत।।


झूठी, थोथी   एकता, का करते   गुणगान।

राष्ट्र - धर्म  कैसे  निभे,नेता यहाँ    महान।।


मत,सत्ता,पदवी मिले,यही 'शुभं'शुचि मन्त्र।

राष्ट्र -  धर्म  कैसे  निभे,ऐसा यह  जनतंत्र।।


🪴 शुभमस्तु !


२१.०६.२०२१◆११.००आरोहणम मार्तण्डस्य।


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