शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

तेरा क्या वश [ गीत ]

 244/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तेरा क्या वश

देह-तंत्र पर

स्वतः अहर्निश चलता।


धड़-धड़ धड़-धड़

हृदय धड़कता

प्राणवंत कहलाए

शक्त-केंद्र

मस्तिष्क शीर्ष पर

तुझको नित्य चलाए

यकृत वृक्क

श्वास फुफ्फुस भी

कभी न तुझको छलता।


हस्त पाद

दो नयन कान की

अपनी -अपनी माया

जीभ नासिका

शीश केश की

अपनी-अपनी छाया

बतला क्या

ये तेरे वश में

इतरा मनुज मचलता।


पाचन ओज -

ग्रहण में तेरी

नहीं भूमिका कण भी

करें विसर्जन

अंग देह से

रहे अवांछित तृण भी

जन्म मृत्यु

क्या तेरे वश में

सूरज तेरा ढलता।


पाकर देह

ऐंठता क्यों तू

तन पर क्रीम सजाए

श्यामल-श्वेत 

रंग कब तेरे

इत्र सुगंध लगाए

एक दिवस

हो हस्र सभी का

एक समान सँभलता।


इच्छा से

आया न जगत में

निज इच्छा कब जाए

मात-पिता 

जो दाता तन के

उनको ही लतियाये

मौन साध

जाता जगती से

हाथ नहीं तू मलता।


शुभमस्तु,


26.07.2026◆4.30 आ०मा०

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