249/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
येन केन प्रकारेण
अपना उल्लू सीधा हो,
दुनिया जाए भाड़ में
अपना काम बने
हमेशा रहो तने।
न कोई नीति
न बचा धर्म,
खोटे होने लगे कर्म,
पाषाण का बना मर्म,
न रहा आँखों में पानी
यही है कहानी।
जितना भी सम्भव हो
हल्ला मचाओ,
किसी न सुनो
बच्चों को बर्गलाओ,
पथ भ्रमित कराओ,
स्वतंत्रता की निशानी।
पहले हम बाद में कुछ और
हमारे सिवाय भला
कौन होगा सिरमौर
ऐसा ही है आज का दौर
न माँ-बाप न पति
प्रेमी से ही
पत्नियों की 'सद्गति',
संस्कार शून्यता
पतन की पराकाष्ठा
मानव की मूढ़ता।
संसद में
सांसदों की असंसदीय भाषा
क्या इनके लिए
किसी दंड का प्राविधान नहीं?
चल रहा है देश और समाज
येन केन प्रकारेण।
सिर चढ़कर
बोलता है विनाश
चिंता नहीं
यद्यपि होता रहे उपहास,
आम आदमी और
पढ़े-लिखे गँवारों में
क्या कोई भेद शेष है ?
जंतर मंतर पर
मेष ही मेष है।
शुभमस्तु,
30.07.2026◆ 9.45 प०मा०
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