गुरुवार, 23 जुलाई 2026

मधुकर के मन में बसी [ गीतिका ]

 239/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मधुकर के मन में बसी,पाटल मधुर सुवास।

झूम-झूम मँडरा रहे,खिली कली के पास।।


तितली  भँवरे से कहे, चलो चलें उस ओर,

कोयल करती काग से,बगिया में परिहास।


कोयल - कागा   से  नहीं,  लेना-देना   एक,

और नहीं   सम्बंध  भी,उनसे अपना खास।


सब अपनी रुचि से करें,अपने काम अनेक,

टाँग फटे में क्यों अड़ा,हमको करनी आस।


सबके सूरज-चाँद का,अलग-अलग है तेज,

जुगनू निकले रात में,सीमित सफल उजास।


नेताजी  नित   चाभते,  काजू   या अखरोट,

गाय  भैंस  बकरी सभी, चबा  रहे बस घास।


'शुभम्' तुम्हारी   राह हैं,अलग-अलग अभिप्रेत,

अलग -अलग जीते सभी,अलग मिले हैं श्वास।।


शुभमस्तु,


20.07.2026◆6.30 आ०मा०

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