239/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
मधुकर के मन में बसी,पाटल मधुर सुवास।
झूम-झूम मँडरा रहे,खिली कली के पास।।
तितली भँवरे से कहे, चलो चलें उस ओर,
कोयल करती काग से,बगिया में परिहास।
कोयल - कागा से नहीं, लेना-देना एक,
और नहीं सम्बंध भी,उनसे अपना खास।
सब अपनी रुचि से करें,अपने काम अनेक,
टाँग फटे में क्यों अड़ा,हमको करनी आस।
सबके सूरज-चाँद का,अलग-अलग है तेज,
जुगनू निकले रात में,सीमित सफल उजास।
नेताजी नित चाभते, काजू या अखरोट,
गाय भैंस बकरी सभी, चबा रहे बस घास।
'शुभम्' तुम्हारी राह हैं,अलग-अलग अभिप्रेत,
अलग -अलग जीते सभी,अलग मिले हैं श्वास।।
शुभमस्तु,
20.07.2026◆6.30 आ०मा०
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