240/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
छरर-छरर छर
छर-छर बरसें
आसमान से बूँदें।
फैला अपने
हाथ हथेली
भर-भर अँजुरी पीते
जेठ मास के
प्यासे मानव
थे मुरझाए जीते
गिरतीं बूँदें
जब पलकों पर
नयन सभी हम मूँदें।
आँगन
गली- गली में बालक
क्रीड़ा में हैं लीन
छपर-छपर छप
छप -छप जल की
तैर रहीं ज्यों मीन
नव किशोर
बालाएँ जल में
नाच-नाच कर कूदें।
तरु पल्लव
हरियाये कोमल
टपर-टपर टप होती
गिरें धरा पर
हरी घास पर
बिखर रहे ज्यों मोती
बिजली- सी
दौड़ती देह में
बूँद मेह की छू दें।
शुभमस्तु,
21.07.2026◆10.30 आ०मा०
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