शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

क्या खूब किसानी!चली गई [ नवगीत ]

 248/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दो -दो बैलों की

 जोड़ी की

क्या खूब किसानी!  चली गई।



वेला थी ब्रह्म मुहूर्त

कृषक भारत का

तज  अपनी शैया 

लेकर बैलों की

जोड़ी को 

धर जुआ कन्ध खेता नैया

अब दौड़ रहे हैं

खेतों में ये ट्रैक्टर

वह अमर निशानी ,छली गई।


तारों से चमकी 

रातों में

खेतों में 'तिक-तिक'  सुनते थे

तब कृषक वीर

हल सीत खुभा

बिटिया के सपने बुनते थे

अब थरथर-टरटर

फोड़ती कान

गोवत्स कहानी ,दली गई।


अब बैल कहाँ

कल-युग आया

चरसा न रहट गाड़ी न रहीं

रथ रब्बे विदा हुए सारे

बछड़े न रहे 

बछड़ी न कहीं

धरती माता की

वह पीढ़ी

व्यवसाय बनिज की गली गई।


शुभमस्तु,


28.07.2026◆ 1.30 आ०मा० (रात्रि)

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